जाने क्यो द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया के नाम से जाने जाते है दादा भाई नौरोजी ?

जाने क्यो द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया के नाम से जाने जाते है दादा भाई नौरोजी ?

 क्या आपको पता है हिंदुस्तान में द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया के नाम से विदेशों में किसे जाना जाता है? वो कौन सा शख्स था जिसने हिंदुस्तान की लूट के विषय में ब्रिटिश संसद में थ्योरी पेश की. 

शायद आपने कभी पहले सुना हो, हम आपको बताते हैं कि द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया के नाम से जाने जाने वाले का नाम दादा भाई नौरोजी था. वो इसी नाम से बहुत ज्यादा प्रसिद्ध थे. इसके अतिरिक्त वो इसी नाम से ब्रिटिश संसद में चुने जाने वाले पहले एशियाई भी थे. संसद मेम्बर रहते हुए उन्होंने ब्रिटेन में हिंदुस्तान के विरोध को प्रस्तुत किया. उन्होंने हिंदुस्तान की लूट के विषय में ब्रिटिश संसद में थ्योरी पेश की.

गुजरात में हुआ था जन्म

ऐसे दादा भाई नौरोजी का आज 30 जून 1917 को मौत हो गई थी, उनका जन्म 4 सितम्बर 1825 को हुआ था. मनेकबाई व नौरोजी पालनजी डोर्डी के पुत्र दादा भाई नौरोजी का जन्म एक ग़रीब पारसी परिवार में गुजरात के नवसारी में हुआ था. साल 1850 में केवल 25 साल की आयु में प्रतिष्ठित एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए थे. इतनी कम आयु में इतना सम्मानजनक ओहदा संभालने वाले वह पहले भारतीय थे. उन्हें 'भारत का वयोवृद्ध पुरुष' (Grand Old Man of India) भी बोला जाता है. 1892 से 1895 तक वे यूनाइटेड किंगडम के हाउस आव कॉमन्स के मेम्बर (एमपी) थे.

एलफिंस्टन इंस्टीटयूट में एजुकेशन ग्रहण की

दादाभाई नौरोजी ने हिंदुस्तान में विश्वविद्यालयों की स्थापना के पूर्व के दिनों में एलफिंस्टन इंस्टीटयूट में एजुकेशन ग्रहण की थी, वो वहां के एक मेधावी विद्यार्थी थे. उसी संस्थान में अध्यापक के रूप में ज़िंदगी शुरुआत कर आगे चलकर वहीं वे गणित के प्रोफेसर बन गए थे. उन दिनों हिंदुस्तानियों के लिए शैक्षणिक संस्थाओं में सर्वोच्च पद था. साथ में उन्होंने समाज सुधार के कार्यों में कई धार्मिक तथा साहित्य संघटनों के रूप में अपना विशेष जगह बनाया. उसकी दो शाखाएं थीं, एक मराठी ज्ञानप्रसारक मंडली व दूसरी गुजराती ज्ञानप्रसारक मंडली. रहनुमाई सभी की भी स्थापना इन्होंने की थी. "रास्त गफ्तार' नामक अपने समय के समाज सुधारकों के प्रमुख लेटर का संपादन तथा संचालन भी इन्होंने किया.

"कैमास' बंधुओं ने अपने व्यापार में भागीदार बनाना चाहा

पारसियों के इतिहास में अपनी दानशीलता व प्रबुद्धता के लिए मशहूर "कैमास' बंधुओं ने दादाभाई को अपने व्यापार में भागीदार बनाने के लिए आमंत्रित किया. तदनुसार दादाभाई लंदन व लिवरपूल में उनका ऑफिस स्थापित करने के लिए इंग्लैंड गए. जो विद्यार्थी उन दिनों उनके सम्पर्क में आए व उनसे प्रभावित हुए उनमें सुप्रसिद्ध फीरोजशाह मेहता, मोहनदास कर्मचंद गांधी व मुहम्मद अली जिना का नाम उल्लेखनीय है.

भारत तथा इंग्लैंड में एक साथ इम्तिहान चलाने का प्रस्ताव

उन दिनों भारतीय सिविल सेवाओं में सम्मिलित होने के इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए सबसे परेशानी की बात यह थी कि उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में ब्रिटिश अभ्यर्थियों से स्पर्धा करनी पड़ती थी. इस असुविधा को दूर करने के लिए दादा भाई का सुझाव इंग्लैंड व हिंदुस्तान में एक साथ सिविल सर्विस इम्तिहान करने का था. इसके लिए उन्होंने 1893 तक आंदोलन चलाया जब कि उन्होंने वहां लोकसभा (हाउस आव कामन्स) में उस सदन के एक मेम्बर की हैसियत से अधिक प्रयत्न किया व सभा ने हिंदुस्तान तथा इंग्लैंड में एक साथ इम्तिहान चलाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.

दरिद्रता के विरूद्ध उठाई आवाज

उन दिनों दूसरी उससे भी बड़ी वेदना हिंदुस्तानियों की भयानक दरिद्रता थी. दादाभाई ही पहले आदमी नहीं थे जिन्होंने इसके उन्मूलन के लिए आंदोलन चलाया. उन्होंने तथ्यों व आँकड़ों से यह सिद्ध कर दिया कि जहां भारतीय दरिद्रता में आकंठ डूबे थे, वहीं हिंदुस्तान की प्रशासकीय सेवा दुनियां में सबसे महंगी थी. 19वीं शताब्दी के अंत तक दादाभाई ने अनेक समितियों व आयोगों के समक्ष ही नहीं वरन् ब्रिटिश पार्लियामेंट के सामने भी हिंदुस्तान के प्रति की गई बुराइयों को दूर करने के लिए वकालत की.

उच्चाधिकारियों को देते चेतावनी

उच्चाधिकारियों को बराबर चेतावनी देते रहे कि यदि इसी प्रकार हिंदुस्तान की नैतिक व भौतिक रूप से अवनति होती रही तो हिंदुस्तानियों को ब्रिटिश वस्तुओं का ही नहीं वरन् ब्रिटिश शासन का भी बहिष्कार करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. हाउस ऑफ कामन्स की सदस्यता प्राप्त करने में उनकी अद्भुत सफलता लक्ष्यपूर्ति के लिए एक साधन मात्र थी. किसी ने कभी यह अपेक्षा नहीं की थी कि दादाभाई हाउस आव कामन्स में इतनी बड़ी हलचल पैदा कर देंगे किंतु उस सदन में उनकी गतिविधि व सक्रियता से ऐसा प्रतीत होता था मानो वे वहां की कार्यप्रणाली आदि से बहुत पहले से ही परिचित रहे हों.

एक शब्द से चल जाए कार्य तो दो का क्यूं करें प्रयोग

वह बोला करते थे कि जब एक शब्द से कार्य चल जाए तो दो शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. एक लिबरल के रूप में वह 1892 में हाउस आफ कामंस के लिए चुने गये. वे एक कुशल उद्यमी थे. 1939 में पहली बार नौरोजी की जीवनी लिखने वाले आरपी मसानी ने ज़िक्र किया है कि नौरोजी के बारे में 70 हज़ार से अधिक दस्तावेज थे जिनका संग्रह अच्छा तरीका से नहीं किया गया.

नौरोजी गोपाल कृष्ण व महात्मा गांधी के गुरु थे. नौरोजी सबसे पहले इस बात को संसार के सामने लाए कि ब्रिटिश सरकार किस प्रकार भारतीय धन को अपने यहां ले जा रही है. उन्होंने ग़रीबी व ब्रिटिशों के राज के बिना हिंदुस्तान नामक किताब लिखी. वह 1892 से 1895 तक ब्रिटिश संसद के मेम्बर रहे. एओ ह्यूम व दिनशा एडुलजी वाचा के साथ मिलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की स्थापना का श्रेय उन्हें जाता है.