उत्तराखण्ड

इस गीत के बिना अधूरे हैं उत्तराखंड के मांगलिक कार्य

भले ही हम नए जमाने मे चल पड़े हो लेकिन पहाड़ की संस्कृति से लोग हमेशा ही जुड़ाव महसूस करेंगे. विवाह, मुंडान जैसे मांगलिक कार्यों में मांगलगीत गाया जाता है. माना जाता है कि किसी काम को शुरू करने से पहले मांगलगीत गाया जाता है. जय माँ भगवती ग्रुप की महिलाएं पिछले 10 वर्षों से कई जगह परफॉर्म करती हैं और इसका महत्व समझा रहीं हैं.

किसी कार्य को करने से पहले ईश्वर का स्मरण

जब आप किसी भी काम को शुरू करते हैं तो उससे पहले अपने ईश्वर को याद करते हैं. इसी तरह जब विवाह आदि मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है तो भगवान गणेश, विष्णु, सूर्य चंद्रमा और पंचनाम आदि कई देवताओं को याद किया जाता है. मांगल गीतों में उनका जिक्र किया जाता है.

वक्त के साथ बदल गई मांगल गीतों की भाषा

शुभ अवसरों पर मांगल गीत गाने वाले आर्टिस्ट को ‘मंग्ल्यौर’ कहा जाता है. हर क्षेत्र की अलग-अलग भाषाएं होती है. आमतौर पर मांगल गीत गढ़वाली भाषा में गाया जाता है लेकिन हर क्षेत्र की भाषा के मुताबिक कुछ शब्द बदल जाते हैं. जय माँ भगवती ग्रुप मंग्ल्यौर रिंकी बताती हैं कि पुराने वक्त की भाषा बहुत जटिल हुआ करती थी कठिन शब्द होने के कारण हम साधारण शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ताकि आमजन को यह समझ आए.

देहरादून की जय माँ भगवती ग्रुप की महिलाएं पिछले 10 सालों से वे अपने साथियों के साथ इसको गा रही हैं. राधा का कहना है कि हम अपनी संस्कृति को अन्य राज्यों की तरह ही ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं. वहिं रीता का कहना है कि पहाड़ से दूर हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से दूर होती जा रही है इसीलिए हम उनके बीच परफॉर्म करते हैं. पूजा नेगी का मानना है कि हम अपने बच्चों को अपने बुजुर्गों की विरासत तोहफे में देना चाहते हैं ताकि हम बता सकें कि सदियों पुरानी हमारे रीति- रिवाज क्या हैं.

गैर पहाड़ी भी पसंद कर रहे मांगल गीत

जय माँ भगवती ग्रुप की महिला मनीषा भट्ट बताती हैं कि पहाड़ की संस्कृति की पहचान बना मांगल गीत आज सिर्फ पहाड़ों तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि वह मैदान में भी अपनी लोकप्रियता बनाता जा रहा है. वह बताती हैं कि जो लोग कई सालों से देहरादून में आकर रह रहे हैं, वह भी अपने शुभ कार्यों में हम लोगों को मांगल गीत के लिए बुलाते हैं. यह हम लोगों को प्रेरित करता है.

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