दूध बेचने वाला शख्स बना करोड़ का मालिक, जानिए कैसे...

मंजिल उन्हीं को मिलती है, जो रास्ते की कठिनाइयों की परवाह किए बिना चलते रहते हैं। ऐसी ही कहानी चंद्रशेखर घोष की है। आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि चंद्रशेखर घोष बंधन बैंक के फाउंडर व मालिक हैं।

घोष व उनकी कंपनी बंधन बैंक की सफलता की कहानी बहुत दिलचस्प है व प्रेरक है। आज इस बैंक को प्रारम्भ हुए 4 वर्ष हो गए हैं। 23 अगस्त 2015 को अरुण जेटली ने इस बैंक को लॉन्च किया था। आज बंधन बैंक की बाजार वैल्यू यानी कुल मूल्य करीब 54 हजार करोड़ रुपये है। आइए आपको बताते हैं कैसे प्रारम्भ हुआ बंधन बैंक।

1960 में त्रिपुरा के अगरतला में जन्मे घोष के पिता मिठाई की एक छोटी सी दुकान चलाते थे। इसमें कठिन से ही उनके नौ सदस्यों के परिवार का गुजारा चल पाता था। घोष ने बचपन से आर्थिक तंगी देखी। वे इसी दुकान में कार्य करते हुए बड़े हुए, लेकिन कभी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। घोष ने बांग्लादेश के ढाका विश्वविद्यालय से सांख्यिकी में मास्टर्स की डिग्री ली है। उनका परिवार मूल रूप से बांग्लादेश का ही है व आजादी के समय वे शरणार्थी बनकर त्रिपुरा में आ गए थे। ढाका में अपनी पढ़ाई पूरी करने बाद उन्होंने पहला कार्य भी वहीं प्रारम्भकिया।

चंद्रशेखर ने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई ग्रेटर त्रिपुरा के एक सरकारी स्कूल में की। उसके बाद ग्रैजुएशन करने के लिए वह बांग्लादेश चले गए। वहां ढाका यूनिवर्सिटी से 1978 में स्टैटिस्टिक्स में ग्रैजुएशन किया। ढाका में उनके रहने व खाने का बंदोवस्त ब्रोजोनंद सरस्वती के आश्रम में हुआ। उनके पिता ब्रोजोनंद सरस्वती के बड़े भक्त थे। सरस्वती जी का आश्रम यूनिवर्सिटी में ही था, इसलिए सरलता से चंद्रशेखर के वहां रहने का बंदोवस्त हो गया। बाकी फीस व कॉपी-किताबों जैसी आवश्यकता के लिए घोष ट्यूशन पढ़ाया करते थे।

एक मीडिया हाउस से बात करते हुए वो कहते हैं कि जब उन्हें पहली बार 50 रुपये कमाई के मिले तो उन्होंने अपने पिता के लिए एक शर्ट खरीदी व शर्ट लेकर वह गांव गए। जब उन्होंने पिता को शर्ट निकाल कर दी तो उनके पिता ने बोला कि इसे अपने चाचा को दे दो, क्योंकि उन्हें इसकी ज्यादा आवश्यकता है। चंद्रशेखर बताते हैं कि ऐसी ही बातों से उन्हें सीखने को मिला कि दूसरों के लिए सोचना कितनी बड़ी बात है।

वर्ष 1985 उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। मास्टर्स समाप्त करने के बाद उन्हें ढाका के एक इंटरनेशनल डेवलपमेंट नॉन प्रॉफिट ऑर्गैनाइजेशन (BRAC) में नौकरी मिल गई। यह संगठन बांग्लादेश के छोटे-छोटे गांवों में स्त्रियों को सशक्त करने का कार्य करता था।

घोष कहते हैं कि वहां स्त्रियों की बदतर स्थिति देखकर मेरी आंखों में आंंसू आ जाते थे। उनकी हालत इतनी बुरी होती थी कि उन्हें बीमार हालत में भी अपना पेट भरने के लिए मजदूरी करनी पड़ती थी। उन्होंने BRAC के साथ लगभग डेढ़ दशक तक कार्य किया व 1997 में कोलकाता वापस लौट आए। 1998 में उन्होंने विलेज वेलफेयर सोसाइटी के लिए कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। यह संगठन लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए कार्य करता था।