उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई में AGR बकाया न चुकाने पर एक बार फिर मोबाइल कंपनियों को लगाई फटकार

 उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई में AGR बकाया न चुकाने पर एक बार फिर मोबाइल कंपनियों को लगाई फटकार

टेलीकॉम कंपनियों के सामने संकट के बादल छंटे नहीं हैं। उच्चतम न्यायालय (Supreme court) ने शुक्रवार को हुई सुनवाई में AGR बकाया न चुकाने पर एक बार फिर मोबाइल कंपनियों को फटकार लगाई। 

उच्चतम न्यायालय ने मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली जियो कंपनी के सवाल किया कि जब वह अनिल अंबानी का ऑरकॉम स्पेक्ट्रम खरीदकर प्रयोग कर सकता है तो बकाया क्यों नहीं चुका सकता। उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे में सुनवाई के लिए सोमवार की तारीख लगाई है।  

उच्चतम कोर्ट ने शुक्रवार को रिलायंस कम्युनिकेशंस व रिलायंस जियो के बीच स्पेक्ट्रम साझा करने के लिये हुये समझौते का विवरण मांगा व सवाल किया कि दूसरी कंपनी के स्पेक्ट्रम का प्रयोग करने वाली कंपनी से सरकार समायोजित सकल राजस्व से संबंधित बकाया राशि की मांग क्यों नहीं कर सकती है।

शीर्ष न्यायालय ने बोला कि स्पेक्ट्रम निजी नहीं बल्कि सरकार की संपत्ति है व इसका प्रयोग करने वाले को ही इसके बकाये का भुगतान करना होगा। न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर व न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने रिलायंस जियो व ऑरकॉम के वकीलों से बोला कि स्पेक्ट्रम साझा करने के समझौते का विवरण पेश किया जाये।

अब 17 अगस्त को होगी मुद्दे की सुनवाई
पीठ ने दूरसंचार विभाग को भी इस विषय में आवश्यक दस्तावेज पेश करने का आदेश दिया व सारे मुद्दे को 17 अगस्त के लिये सूचीबद्ध कर दिया। शीर्ष न्यायालय ने दूरसंचार विभाग को एयरटेल सहित दूसरी संचार कंपनियों, जो दिवालिया व शोधन अक्षमता संहिता के तहत कार्यवाही का सामना कर रही हैं, के स्पेक्ट्रम के प्रयोग से संबंधित विवरण भी पेश करने का आदेश दिया।

इस मुद्दे की सुनवाई के दौरान ऑरकॉम के लिये रिजोल्यूशन प्रोफेशनल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने बोला कि सरकार को स्पेक्ट्रम साझा करने के लिये 2016 में हुये समझौते के बारे में सूचित कर दिया गया था व इसके लिये देय शुल्क का भुगतान भी कर दिया गया था।

उन्होंने बोला कि स्पेक्ट्रम का एक भाग कंपनी के पास ऐसे ही रखा है व इसका कारोबार नहीं हुआ है लेकिन इसे सिर्फ साझा किया गया है। पीठ ने इस पर बोला कि रिलायंस जियो को ऑरकॉम की ओर से बकाया एजीआर का भुगतान करने के लिये क्यों नहीं बोला जा सका क्योंकि यह बकाया राशि तो स्पेक्ट्रम के उपयोग के विषय में है व जियो तीन वर्ष से इसका प्रयोग कर रहा है।

दीवान ने जब यह बोला कि ऋणदाताओं ने ऑरकॉम के लिये निवारण योजना को यूवी एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को मंजूरी दी है तो पीठ ने बोला कि वह जानना चाहती है कि यूवी एआरसी के पीछे कौन है। जियो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केवी विश्वनाथन ने बोला कि कंपनी एजीआर से संबंधित बकाये का भुगतान कर चुकी है लेकिन इस सवाल पर उसे आदेश लेने होंगे।

उन्होंने पीठ को स्पेक्ट्रम साझा करने व स्पेक्ट्रम के उपायोग के दिशा निर्देशों के बारे में पीठ को स्पष्टीकरण देने के कोशिश किये व बोला कि कंपनी सभी नियमों का पालन कर रही है व देय शुल्क का भुगतान कर रही है।

पीठ ने फिर बोला कि रिलायंस जियो अपनी जिम्मेदारी से कैसे बच सकती है जबकि वह स्पेक्ट्रम का प्रयोग कर रही है व राजस्व साझा कर रही है। कोर्ट ने 10 अगस्त को दूरसंचार विभाग से जानना चाहा था कि दिवालिया कार्यवाही का सामना कर रहीं दूरसंचार कंपनियों से समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) से संबंधित बकाया राशि की वसूली कैसे करेगी? क्या इन कंपनियों के स्पेक्ट्रम बेचे जा सकते हैं?

मोबाइल कंपनियों को लगाई कड़ी फटकार
दूरसंचार विभाग ने कोर्ट से बोला था कि उसका यह मानना है कि दिवालिया कार्यवाही का सामना कर रही दूरसंचार कंपनियां स्पेक्ट्रम नहीं बेच सकती क्योंकि यह उनकी संपत्ति नहीं है। कोर्ट ने उस समय बोला था कि न्यायालय को दिवाला व शोधन अक्षमता संहिता के तहत दिवालिया कार्यवाही के लिये गयी दूसंचार कंपनियों की वास्तविकता का पता लगाने की जरूरत है।

यही नहीं, शीर्ष न्यायालय ने यह भी बोला था कि कोर्ट इन दूरसंचार कंपनियों के दिवालिया प्रक्रिया के लिये जाने की वजह जानना चाहता है व इन कंपनियों की देनदारियों के बारे में भी जानना चाहता है। उसने साथ ही बोला कि दिवाला प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जल्दी क्या थी।

शीर्ष न्यायालय ने 20 जुलाई को स्पष्ट कर दिया था कि वह दूरसंचार कंपनियों के एजीआर से संबंधित बकाया, जो 1.6 लाख करोड़ रुपये है, के पुन:आकलन या पुन: गणना के बारे में एक सेकंड भी कोई दलील नहीं सुनेगी। कोर्ट ने यह भी बोला था कि इस बकाया राशि का भुगतान करने के लिये 15 से 20 वर्ष का समय देने का प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं है।

एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) क्या है?
एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) सरकार के संचार मंत्रालय के टेलीकॉम विभाग से ली जाने वाली लाइसेंसिंग फीस व स्पेक्ट्रम चार्जेज हैं। जो कंपनियों को सरकार को बतौर रेवेन्यू शेयर देना होता है। AGR के दो हिस्से होते हैं। एक स्पेक्ट्रम चार्जेज दूसरा लाइसेंसिंग फीस। दोनों को मिलाकर टेलीकॉम कंपनियों को करीब 10% रेवेन्यू सरकार को देना होता है।

क्या है AGR का टकराव ?
टेलीकॉम विभाग व टेलीकॉम कंपनियों के बीच AGR के कैलकुलेशन को लेकर टकराव था। टेलीकॉम विभाग का बोलना था कि AGR कंपनी की कुल आय पर लगना चाहिए। इसका मतलब ब्याज से कमाई, एसेट बिक्री से कमाई जैसे नॉन टेलीकॉम आय पर भी कर लगना चाहिए। वहीं टेलीकॉम कंपनियों का बोलना था कि AGR का कैलकुलेशन सिर्फ टेलीकॉम सर्विसेज से होने वाली आय के आधार पर होना चाहिए न कि पूरी आय पर। कंपनियों व टेलीकॉम विभाग के बीच ये टकराव 2005 से चला आ रहा है। तब टेलीकॉम कंपनियों के संगठन ने टेलीकॉम विभाग के दावे को चुनौती दी थी। इसके बाद ये मुद्दा उच्चतम न्यायालय पहुंचा।