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International Yoga day 2024: योग स्वस्थ शरीर का मुख्य सारथी है, इसे न करें दूर

योग की आड़ में राष्ट्र के भीतर बड़ा धंधा पनप गया है. महानगरों से लेकर कस्बों-गांवों में भी बड़े-बड़े इंस्टीट्यूट, प्रशिक्षण केंद्र, योग टीचरों की फौज तैयार हो गई है. योग पर किसी का पेटेंट नहीं होना चाहिए और न ही कोई इसकी किसी को ठेकेदारी करनी चाहिए. योग शरीर को चंगा रखने का मजबूत हथियार है और सदैव रहेगा. देखकर दुख होता है जब योग का शारीरिक जरूरतों से कहीं अधिक मौजूदा समय में उसका व्यावसायिक, धार्मिक और राजनीति में इस्तेमाल होता है. योग को मात्र स्वस्थ काया तक ही सीमित रखना चाहिए. उसकी आड़ में सियासी जरूरतें पूरी नहीं करनी चाहिए. योग गुरू कहलाकर समूचे संसार में प्रसिद्वि पा चुके बाबा रामदेव ने निश्चित रूप से योग का प्रचार जबरदस्त ढंग से किया. इस दरम्यान उन्होंने बड़ा व्यवसाय भी स्थापित किया. बाजार में हजारों प्रोड्क्टस उतारकर उनकी कंपनी का टर्नओवर लाखों-करोड़ों में नहीं, बल्कि अरबों में पहुंच गया है.

विवादों के इतर देखें तो बाबा रामदेव की कोशिशों की बदौलत ही योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यताएं मिली. केंद्र गवर्नमेंट ने भी प्रचार-प्रसार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. उसके बदले गवर्नमेंट ने भी उनका लाभ चुनावों में जमकर उठाया. इस सच्चाई से भी मना नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे योग विज्ञान का कुछ समय बीतने के बाद हानि हुआ. योग सत्ता पक्ष और विपक्ष में बंटकर बीजेपी और कांग्रेस पार्टी हो गया. जब पहला योग दिवस मना, तो कांग्रेस पार्टी सहित अनेक विपक्षी दलों ने आयोजन का वॉकआउट किया. यहां तक उन्होंने और उनके कार्यकर्ताओं ने भी योग नहीं किया. लेकिन बीजेपी ने हर्षोल्लास से मनाया. दरअसल, उनके मनाने का कारण क्या था, सभी को पता था. ठीक है, यदि विपक्षी दलों को बाबा रामदेव से कोई विरोध या ना-खुशी है, तो उनको योग को विरोध की केटेगरी में नहीं रखना चाहिए.

बहरहाल, कोई कहे बेशक कुछ न, पर राजनीति ने योग को धर्म से छोड़ने की भी कोशिशें की. योगासनों में भी धर्मों की एबीसीडी खोजी जाती है. दूसरा, सबसे दुःखद पहलू योग के साथ ये जुड़ा, योग का व्यावसायिकरण कर दिया गया. कईयों की दुकानें योग की आड़ में चल पड़ी हैं. बड़े-बड़े प्रतिष्ठान, कॉलेज, स्कूल, प्रशिक्षण केंद्र संचालित हो गए हैं, जहां योग सीखाने के नाम पर मोटा माल काटा जा रहा है. योग गुरूओं, एक्सपर्टस और प्रशिक्षकों की तो फौज ही खड़ी हो गई है. बड़े-बड़े नेताओं ने अपने लिए पर्मानेंट योग प्रशिक्षक हायर किए हुए हैं. कुल मिलाकर योग को लोगां ने अब पूरी तरह से स्टेटस सिंबल बना डाला है. यानी मध्यम वर्ग और गरीबों की पहुंच से बहुत दूर कर दिया गया है.

योग विधा नयी नहीं है, पांच हजार पूर्व ऋषि परंपराओं से मिली अनमोल धरोहर जैसी है. अधिक पुराने समय की बात न करें, केवल आजादी तक का इतिहास खंगाले तो पता चलता है कि उस समय तक भी चिकित्सा विज्ञान ने उतनी कामयाबी नहीं पाई थी जिससे अचानक उत्पन्न होने वाली रोंगों से तुरंत उपचार कराया जाए. उस समय भी जड़ी-बुटियों और नियमित योगासन पर ही समूचा संसार निर्भर हुआ करता था. अंग्रेजी दवाओं का विस्तार कोई चालीस-पचास के दशक से बल पकड़ा है. तब मात्र एकाध ही फार्मा कंपनियां हुआ करती थी, जो अंग्रेजी दवाइयों का निर्माण करती थीं. विस्तार अस्सी के दशक के बाद शुरुआत हुआ. आज तीन से चार हजार के करीब फार्मा कंपनियां अंग्रेजी दवा बनाने में लगी हैं. बावजूद इसके योग का बोलबाला दिनों दिन बढ़ रहा है.

जानकार बताते हैं कि अंग्रेजी दवाइयां तुरंत असर तो करती हैं. पर, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता हिला देती हैं. शायद, इस सच्चाई से आम लोग अनभिज्ञ होते हैं कि बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियों के मालिक भी नियमित योगासन करते हैं. क्योंकि उनको योग के लाभ पता होते हैं. योग को एक नहीं, बल्कि हजारों बड़ी और गंभीर रोंगों से लड़ने का हथियार माना गया है. समय फिर से पल्टा है, इसलिए लोग धीर-धीरे पुरानी दवा पद्वितियों की ओर लौटने लगे हैं. वर्षों पुरानी हेल्थ प्रॉब्लम से छुटकारा पाने के लिए रोगी योग की सहायता लेने लगे हैं. अनुभवी डॉक्टर्स भी अपने पेशेंट को डेली रूटीन में योग शामिल करने की राय देते हैं. योग डॉक्टर मंगेश त्रिवेदी की माने तो ऐसे कई मुकदमा सामने आए हैं, जिसमें 15-20 वर्ष पुरानी रोग को समाप्त करने के लिए लोगों ने पहले योग की सहायता ली और 3 से 4 महीने में इसका असर भी देखा है.

बहरहाल, आवश्यकता इस बात की है कि योग को राजनीति और धर्म के मैदान में ना घसीटा जाए. कुछ सियासी दल योग और योग को नियमित अपनाने वालों को अपना वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. कुछ लोग योग पर एक छत्र राज और अपनी ठेकेदारी भी जमाते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए, योग सबके लिए है और वह भी निःशुल्क. योग हमें ऋषियों-मुनियों द्वारा दी गई बेशकीमती सौगात है. हमारी धरोहर है जिसे हमारे पूर्वज हमारे लिए छोड़कर गए हैं. इसे सजोकर रखना हम सबका परमदायित्व बनता है. योग के फायदों से हम परिचित हैं. योग को लेकर हमें किसी लोभ-लालच में नहीं पड़ना चाहिए. योग करने वालों को बीजेपी का कार्यकर्ता, रामदेव का अनुयायी या आरएसएस का शुभचिंतक नहीं समझना चाहिए. हालांकि, ऐसी मिथ्या अब लोगों से दूर हुई है. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी अपने स्वास्थ्य की परवाह करते हुए योग को अपनाएं. ‘विश्व योग दिवस’ का मकसद हममें योगासन के प्रति ललक पैदा करना और दूसरों को योग के लिए जागरूकता करना मात्र होता है. योग स्वस्थ शरीर का मुख्य सारथी है, इसे दूर न करें, नियमित अपनाएं.

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