कॉलेज के एक प्राध्यापक ने कोरोना वायरस के सामाजिक पाठ को लेकर किया यह बड़ा खुलासा

कॉलेज के एक प्राध्यापक ने कोरोना वायरस के सामाजिक पाठ को लेकर किया यह बड़ा खुलासा

इलाहाबाद के पास मुख्य मार्ग से लगा एक गांव है. शाम के वक्त इस गांव के मार्केट में जो चर्चा हो रही थी, वह कोरोना पर ही केंद्रित थी. किसी को लग रहा था कि कोरोना हैजा व प्लेग की तरह महामारी है. 

कोई कह रहा था, यह चाइना से आयातित बीमारी है. जैसे चाइना सामान बनाता है, वैसे ही बीमारी भी. कॉलेज के एक प्राध्यापक ने बोला कि कोरोना बीमारी आधुनिकता का सह उत्पाद है. यह विकसित देशों, समाजों  एवं सभ्यताओं से संक्रमण कर हम लोगों तक पहुंच रही है. उनकी बात ने हमें सोचने का एक सूत्र दिया कि कोरोना का सामाजिक पाठ क्या होने कि सम्भावना है. कोरोना किस प्रकार एक सामाजिक वृतांत का रूप  लेता जा रहा है.

कोरोना से हम भयभीत हैं, सशंकित हैं, उसके प्रति सजग हैं, साथ ही, अपने वृत्तांतों में व्यंग्य, उपेक्षा एवं निकृष्ट कृत्यों के प्रतीक के रूप में भी उसका प्रयोग कर रहे हैं. एक तरफ हम कोरोना जनित मौत की संभावना से डरे हुए हैं, दूसरी तरफ उस पर हंस भी रहे हैं. यह ऐसा ही है, जैसे कोई काशी के मणिकर्णिका में मृत शरीर को जलते देख हंस रहा हो. आधुनिकता ने एक तरफ हमें  आरामदायक ज़िंदगी स्थितियां मुहैया कराई हैं, दूसरी तरफ सर्वग्रासी संकट भी खड़ा किया है. यह संकट विज्ञान एवं आधुनिकता के गर्व को तोड़ते हुए महामृत्यु के तांडव में बदल गया है. 

हम भूमंडलीकरण से बहुत खुश हुए थे. आज भूमंडलीकरण के माध्यम से मौत का डर भी हम तक चलकर आ रहा है. विज्ञान बेबस है, चर्च, मस्जिद, मंदिर बंद कर दिए गए हैं, अध्यात्म में इस स्थिति से मुक्ति के लिए शायद ही कोई मार्ग दिखता हो, तो योग एवं आयुर्वेद भी इससे मुक्ति के बारे में सोच नहीं पाए हैं. पश्चिम एवं पूरब, जिन्हें हम कई बार एक दूसरे के विकल्प के रूप में देखते हैं, आज बेबस लग रहे हैं. प्रदेश ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा मुखर एवं सजग हैं. किंतु जो मार्केट 21वीं सदी में सर्वाधिक शक्तिवान हो उभरा था, वह सबसे ज्यादा भयभीत है. शेयर मार्केट गिर रहे हैं. आर्थिक विकास दर के नीचे जाने की संभावना जाहीर की जा रही है. 
 
पर्यटन, होटल, यातायात सब संकट में आ गए हैं. इन्सानियत ने डर के इन कारणों को खुद पैदा किया है. उसने अपनी धरती, अपने पर्यावरण की उपेक्षा की तथा घनघोर उपभोक्तावाद व सुविधाभोगी प्रवृत्ति को तरजीह दी, जिस कारण हम मानवीयता को ऐसी त्रासद स्थिति में देख रहे हैं. कोरोना वस्तुतः असंतुलित आधुनिकता का
सह उत्पाद है. हमारी पारंपरिक संस्कृतियों में धीमेपन, घैर्य व रुकने का महत्व था, पर आधुनिकता ने हमें इतना गतिमान बनाया कि आज हमें ठोकर लग रहे हैं. असंतुलित विकास कई बार विनाश का स्फोट पैदा करता है. 

विनाश का यह स्फोट रुद्र के तांडव की तरह है, जिससे हमें हमारा समाज, सभ्यता एवं संस्कृति का संतुलन भाव ही बचा सकता था. किंतु आज स्थिति हमारे हाथों से निकल गई है. स्वार्थ, लोलुपता, आक्रमक उपभोक्तावाद, मार्केट पर कब्जे की लड़ाई, धन का लोभ, मारक वैयक्तिकता, सत्ता एवं शक्ति की चाह आदि आज हमारे समक्ष भीषण संकट खड़ा कर रहे हैं. याद करना चाहिए कि हैजा व प्लेग भी उपनिवेशवाद के आक्रामक प्रसार के दिनों में हिंदुस्तान में आए थे. आज भी आधुनिकता, बाजार, असंतुलित विकास एवं आधुनिकता के नए उपनिवेशों का सृजन एक नयी महामारी लेकर आई है. इन्सानियत में हालांकि अपने संकटों के निवारण की अद्भुत क्षमता है. बहुत ज्यादा कुछ खोकर भी वह अपने को फिर से रच लेती है. इन्सानियत की इसी शक्ति पर हमें विश्वास करना चाहिए.