उठाइए इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम का लुत्‍़फ़, जाने मुहब्‍बत का जिक्र

उठाइए इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम का लुत्‍़फ़, जाने मुहब्‍बत का जिक्र

शेरो-सुख़न (Shayari) की संसार में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ स्थान मिली है। इन्‍हें बहुत ही दिलकश अंदाज़ में काग़ज़ पर उकेरा गया है। बात चाहे इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) की हो या किसी व मसले पर क़लम उठाई गई हो। 

शायरी में हर जज्‍़बात (Emotion) को तवज्‍जो मिली है। आज हम शायरों के इसी बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए 'रेख्‍़ता' के साभार से लेकर हाजि़र हुए हैं। शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'इश्‍क़' की हो, मुहब्‍बत का जिक्र हो। तो आप भी इस इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम का लुत्‍़फ़ उठाइए

व भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें व भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
रंजिश ही ठीक दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
अहमद फ़राज़

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे कार्य के
मिर्ज़ा ग़ालिब

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने व मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में पराजय के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए जीवन क्या चीज़ है
निदा फ़ाज़ली

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
अकबर इलाहाबादी

किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
अहमद फ़राज़

इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है
मुस्तफ़ा ज़ैदी

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
हसरत मोहानी

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूं आज तेरे नाम पे रोना आया
शकील बदायूंनी

जीवन किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
जौन एलिया

कोई समझे तो एक बात कहूं
इश्क़ तौफ़ीक़ है अपराध नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी

दिल में किसी के राह किए जा रहा हूं मैं
कितना हसीं अपराध किए जा रहा हूं मैं
जिगर मुरादाबादी



वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
परवीन शाकिर