शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'मय' की हो व 'मयख़ाने' का जिक्र उठाइए लुत्‍़फ़

 शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'मय' की हो व 'मयख़ाने' का जिक्र उठाइए लुत्‍़फ़

शेरो-सुख़न (Shayari) की दुनिया में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ काग़ज़ पर उकेरा गया है। बात चाहे इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) की हो या किसी व मसले पर क़लम उठाई गई हो।

 शायरी में हर जज्‍़बात (Emotion) को ख़ूबसूरती के साथ तवज्‍जो मिली है। यहां मय यानी शराब व मयकदे के विषय को भी बेहद खूबसूरत अल्‍फ़ाज़ में बांधा गया है। हर शायर के यहां इसका अलग रंग है व इसको लेकर अलग अंदाज़। आज हम शायरों के इसी बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए 'रेख्‍़ता' के साभार से लेकर हाजि़र हुए हैं। शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'मय' की हो व 'मयख़ाने' का जिक्र भी हो। तो आप भी इसका लुत्‍़फ़ उठाइए



आए थे हंसते खेलते मयख़ाने में 'फ़िराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए
फ़िराक़ गोरखपुरी
दिन रात मयकदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए
अख़्तर शीरानी

गुज़रे हैं मय-कदे से जो तौबा के बाद हम
कुछ दूर आदतन भी क़दम डगमगाए हैं
ख़ुमार बाराबंकवी

दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम
बस तरसते ही चले अफ़्सोस पैमाने को हम
नज़ीर अकबराबादी

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
आओ कहीं शराब पिएं रात हो गई
निदा फ़ाज़ली

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यों
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
मिर्ज़ा ग़ालिब

लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूं ज़ाहिद
हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं
दाग़ देहलवी

पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब
कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूं मैं
जिगर मुरादाबादी

तर्क-ए-मय ही समझ इसे नासेह
इतनी पी है कि पी नहीं जाती
शकील बदायूंनी

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे
मिर्ज़ा ग़ालिब