जिगर' मुरादाबादी आपके लिए लेकर आए है इश्क का फसाना

जिगर' मुरादाबादी आपके लिए लेकर आए है इश्क का फसाना

जिगर' मुरादाबादी का जन्‍म 6 अप्रैल 1890 को शायर पिता मौलाना अली 'नज़र' के घर हुआ। मगर अली सिकंदर से 'जिगर' मुरादाबादी हो जाने तक का उनका सफर सरल नहीं रहा। पेट पालने के लिए उन्‍हें कई तरह के कार्य करने पड़े। 

देखने में खूबसूरत नहीं थे, मगर उनके शेर कहने की अच्छाई के आगे यह बात बेमायनी होकर रह गई। 'जिगर' मुरादाबादी जब अपने दिलकश तरन्नुम में अपनी शायरी पढ़ते थे, तो सुनने वाले दीवाना हुए बिना नहीं रह पाते थे। उनकी शायरी में इश्‍क़़ व दर्द की वह कशिश नज़़र आती है, जो आज भी दिलों को अपनी ओर खींचती है।  हम भी आपके लिए 'रेख्‍ता' के साभार से लाए हैं 'जिगर' की शायरी से चुन कर चंद मोती

मेरे इश्क का फसाना
यह फलक यह माह-ओ-अंजुम यह जमीन यह जमाना

तेरे हुस्न की हिकायत मेरे इश्क का फसाना



यह है इश्क की करामत यह कमाल-ए-शायराना

अभी मुंह से बात निकली अभी हो गई फसाना

ये मेरा पयाम बोलना तू सबा मुअद्दबाना

कि गुजर गया है प्यारे तुझे देखे इक जमाना

मुझे चाक-ए-जेब-ओ-दामन से नहीं मुनासिबत कुछ

ये जुनूं ही को मुबारक रह-ओ-रस्म-ए-आमियाना

तुझे हादसात-ए-पैहम से भी क्या मिलेगा नादां

तेरा दिल अगर हो जिंदा तो नफस भी ताजियाना

वह अदा-ए-दिलबरी हो कि नवा-ए-आशिकाना

जो दिलों को फतह कर ले वही फातेह-ए-जमाना



हुस्‍न के एहतराम ने मारा
हुस्न के एहतराम ने मारा

इश्क बे-नंग-ओ-नाम ने मारा

वादा-ए-ना-तमाम ने मारा

रोज की सुब्ह ओ शाम ने मारा

लरजिश-ए-दस्त-ए-शौक आह न पूछ

लग्जिश-ए-नीम-गाम ने मारा

इश्क की सादगी तो एक तरफ

शौक के एहतमाम ने मारा

अल्लाह-अल्लाह नफ्स की आमद ओ शुद

इस पयाम ओ सलाम ने मारा

इश्क मरता न अपनी मृत्यु से आह

आशिकान-ए-कराम ने मारा

काश वो उम्र-ए-खिज्र बन जाए

जिन ख्‍यालात-ए-खाम ने मारा

मैं नहीं बिस्मिल-ए-खय्याम 'जिगर'

हाफिज-ए-खुश-कलाम ने मारा
वह हम में समाए जाते हैं

नियाज ओ नाज के झगड़े मिटाए जाते हैं

हम उन में व वह हम में समाए जाते हैं

शुरू-ए-राह-ए-मुहब्बत अरे मआज-अल्लाह

यह हाल है कि कदम डगमगाए जाते हैं

यह नाज-ए-हुस्न तो देखो कि दिल को तड़पा कर

नजर मिलाते नहीं मुस्कुराए जाते हैं

मेरे जुनून-ए-तमन्ना का कुछ ख्‍याल नहीं

लजाए जाते हैं दामन छुड़ाए जाते हैं

जो दिल से उठते हैं शोले वह रंग बन बन कर

तमाम मंजर-ए-फितरत पे छाए जाते हैं

मैं अपनी आह के सदके कि मेरी आह में भी

तेरी निगाह के अंदाज पाए जाते हैं

रवां दवां लिए जाती है आरजू-ए-विसाल

कशां कशां तेरे समीप आए जाते हैं

कहां मनाजिल-ए- शख़्सियत कहां हम अहल-ए-फना

अभी कुछ व यह तोहमत उठाए जाते हैं

मेरी तलब भी उसी के करम का सदका है

कदम यह उठते नहीं हैं उठाए जाते हैं

इलाही तर्क-ए-मुहब्बत भी क्या मुहब्बत है

भुलाते हैं उन्हें वह याद आए जाते हैं

सुनाए थे लब-ए-नय से किसी ने जो नगमे

लब-ए-'जिगर' से मुकर्रर सुनाए जाते हैं