जाने पंडित बिरजू महाराज का कैसे जुड़ा कथक से जीवन

जाने पंडित बिरजू महाराज का कैसे जुड़ा कथक से जीवन

कहते हैं आत्मा व परमात्मा के मिलन से एक अनोखे, अद्भुत, अद्वितीय आनंद का अनुभव होता है। यही आनंद होता है जब आप कथक व पंडित बिरजू महाराज का नाम एक साथ लें। एक आत्मा है तो दूसरा परमात्मा। 

आप कथक को बिरजू महाराज व बिरजू महाराज को कथक भी कह सकते हैं। आज हम आपको लेकर चलते हैं बिरजू महाराज के बचपन के उन दिनों में जब वो पंडित नहीं थे, जब वो विश्वविख्यात कथक कलाकार नहीं थे। उनका भी बचपन था, शैतानियां थीं, रूठना-मनाना था। हमारे आपके घर के बच्चों की तरह नन्हें बिरजू को भी पतंग उड़ाने का शौक था। कैसे याद करते हैं पंडित जी वो पतंग उड़ाने वाले दिन?

“देखिए, ये हर किसी को पता है कि लखनऊ में लोगों को पतंग उड़ाने का शौक किस कदर होता है। मैं भी या तो नृत्य देख रहा होता था या फिर पतंग उड़ाने में फंसा रहता था। पतंग उड़ाकर लौटा तो सीधा तालीमखाने में बाबू जी के पास जाकर बैठ जाता था। जब हमारे बाबू अच्छन महाराज किसी को कुछ सिखाएं तो मैं भी उनके सामने हाथ पैर हिलाने लगता था। बाबू जी के अतिरिक्त चाचा शंभू महाराज जी को भी अपने शिष्यों को सिखाते हुए मैं देखता रहता था। "

“हां ये आप अच्छा कह रहे हैं। हुआ यूं था कि 5-6 वर्ष की आयु तक पहुंचते पहुंचते मेरे कदम भी कथक की तरफ पूरी तरह खिंच चुके थे। पिताजी को भी समझ आ गया था कि मैं भी अब कथक ही करूंगा तो उन्होंने भी मुझे सिखाना प्रारम्भ कर दिया था। ये उसी समय की बात है जब हमारे बाबू अच्छन महाराज जी रामपुर के नवाब के यहां जॉब करते थे। इससे पहले भी हमारे पूवर्जों ने नवाबों के महलों में नृत्य किया था। ठाकुर प्रसाद जी ने तो बाकयदा नवाब वाजिद अली शाह को कथक सिखाया भी था। ये सदियों पुरानी परंपरा की तरह चला आ रहा था। रामपुर के नवाब बाबू जी का बड़ा सम्मान भी करते थे। रामपुर के नवाब मुझे भी बहुत मानते थे। मैं 6 बरस की आयु का था, जब मैं पहली बार उनके महल में नाचा था। उसके बाद तो ऐसा हुआ कि नवाब साहब अक्सर बाबू जी से कहते थे कि बेटे को भी साथ लाना। बाबू जी के कहने पर मैं चला तो जाता था, लेकिन छोटा बच्चा रात तक नींद आने लगती थी। पता चला कि एक तरफ नृत्य की महफिल चल रही है दूसरी तरफ मुझे झपकियां आ रही हैं। मुझे याद है कि नवाब साहब के यहां से लौटकर मैंने अम्मा से कई बार शिकायत भी की, ये कौन सी बात है रात में जगा देते हैं। लेकिन रामपुर के नवाब को हमारी कला की कद्र थी, इसलिए वहां हमारा नाचना चलता रहा”।

“जब मैं पैदा हुआ तो सबसे पहले मेरा नाम रखा गया दुख हरण, फिर बाद में मेरा नाम बदला गया। इस बार भगवान कृष्ण से जोड़कर मेरा नाम रखा गया बृजमोहन नाथ मिश्रा, जो धीरे धीरे बिरजू हो गया व फिर बिरजू महाराज। बचपन में मैं तालीमखाने में जरूर जाता था, चाहे वहां जाकर कुछ खाता पीता ही रहूं लेकिन अपने बाबू जी, चाचा जी व उनके शागिर्दों को कथक करते देखते रहना बड़ा अच्छा लगता था। मैं चुपचाप एक कोने में बैठकर सबकुछ देखता रहता था। वहां से लौटकर मैं अपनी अम्मा से कहता था, अम्मा देखो देखो वो लोग जो करते हैं, वो तो मुझे भी आता है। मैं बाकयदा वैसा ही नृत्य करने की प्रयास भी करता था, आयु कम थी तो कई बार ऐसा भी हुआ कि नृत्य करते करते मैं गिर पड़ा। अम्मा के चेहरे पर चिंता व मुस्कान एक साथ आती थीं, तब अम्मा कहती थीं जब बड़े हो जाना तब नाचना अभी सिर्फ देखो व सुनो”।

“कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि अब ज़िंदगी आगे कैसे बढ़ेगा। गर्दिशों के दिन प्रारम्भ हुए। पैसे रुपये से लेकर हर तरह की परेशानियां सामने आईं। ऐसे कठिन वक्त में अम्मा ने हौसला दिखाई। अम्मा मुझे यहां-वहां लेकर जाती थीं, कभी बांस बरेली, तो कभी जयपुर। हम लोग नेपाल तक गए। मैं उस जमाने की बात कर रहा हूं जब नेपाल जाने में तीन दिन का पैदल सफर करना होता था, लेकिन वो पराजय नहीं मानीं, मुझे साथ ले गई। उस वक्त बस यही लगता था कि हमारा नृत्य देखकर राजा साहब खुश हो जाएं। कहीं से पचास रुपये भी मिल जाएं तो बहुत है। उस पैसे से कुछ दिनों तक खाना-पीना तो चलेगा ही। फिर हम लोग कानपुर गए। कानपुर में हमारी बड़ी बहन थीं। मैं वहां अपने जीजा जी के साथ करीब करीब साढ़े चार वर्ष तक रहा। 11-12 वर्ष की आयु में ही मैंने दो ट्यूशन भी किए। उस आयु में क्या ट्यूशन किया होगा, लेकिन कार्य करने की शुरूआत हो गई। इसके बाद कपिला वात्सायन जी लखनऊ गईं, तो उन्होंने अम्मा से पूछा कि बेटा कुछ करता है क्या। कपिला जी हमारे पिता जी की शार्गिद थीं, वो हमको अपने साथ ले आई। उन्होंने ही मुझे भी हिंदुस्तानी म्यूजिक एंड डांस स्कूल में डाल दिया था, मुझे आज भी याद है कि वो अम्मा से ये कहकर मुझे साथ लाई थीं कि बिरजू को 6 महीने के लिए ले जाते हैं भगवान ने सफल किया तो बहुत अच्छा अन्यथा देखी जाएगी। मैंने वहीं पर कार्य प्रारम्भ किया, व मेरे कार्य से सबलोग खुश हो गए”।

“फिर चार पांच वर्ष वहीं रहे, अच्छी तरह कार्य किया। कला को जितनी डूबकर सीख सकते थे, सिखा। जितना सिखा सकते थे, सिखाया भी। उसके बाद ज़िंदगी में भगवान की कृपा रही। मैं वहां से भारतीय कला केन्द्र आया फिर कथक केन्द्र पहुंचा व ऐसे ही धीरे धीरे सफर आगे बढ़ता रहा। दिन रोजाना सोच व विचार बढ़ते गए। मैने अनेकों रचनाएं कीं। वहीं से नाम मिला, वहीं से इज्जत मिली। इस बीच कोलकाता व मुंबई आना जाना भी लगा रहा। कोलकाता को अक्सर मैं अपने करियर की मां कहता हूं व महाराष्ट्र को पिता। महाराष्ट्र माने मुंबई। आज भी मैं पूरी मेहनत व ईमानदारी से कार्य करता हूं, बच्चों को सिखाता हूं। मेरे पास देश विदेश के लोग आते हैं। देश के अंदर भी बहुत सी वर्कशॉप करता रहता हूं। कोलकाता, दिल्ली पटना लखनऊ, मुंबई। ऐसे ही ज़िंदगी चलता रहता है। मुझे याद है कि प्रयत्न के दिनों में यानी पिता जी के जाने के बाद अम्मा हमारी व मैं अम्मा का मददगार रहा। अम्मा ने हमेशा बोला कि बेटा चाहे खाने को थोड़ा कम मिले लेकिन जो पिता जी व चाचा ने सिखाया है, उसको ईमानदारी से करना। फिर मैंने भी सारे मन से कार्य किया। उसके बाद भगवान की कृपा से सब कुछ अच्छा होता चला गया। पहले बस से चलते थे, फिर साइकिल आई, अब गाड़ी भी आ गई। भगवान की कृपा से आज सबकुछ है”।