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6 फरवरी को षटतिला एकादशी पर जरूर करें इस कथा का पाठ

हर वर्ष माघ माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के अगले दिन षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाता है. ज्योतिषीय गणना के मुताबिक इस वर्ष 6 फरवरी को षटतिला एकादशी है. यह दिन ईश्वर विष्णु को समर्पित होता है. इस दिन साधक षटतिला एकादशी व्रत रख ईश्वर विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं. माना जाता है की बिना षटतिला एकादशी की कथा का पाठ किए एकादशी व्रत सम्पूर्ण नहीं होता है. इसलिए पढ़ें षटतिला एकादशी व्रत की कथा-कहानी और ईश्वर विष्णु की आरती-

एक बार नारद जी ने ईश्वर विष्णु से षटतिला एकादशी का महत्व पूछा, वे कहे – ‘हे प्रभु! आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें. षटतिला एकादशी के उपवास का क्या पुण्य है? उसकी क्या कथा है, कृपा कर मुझसे बताइए. नारद जी की प्रार्थना सुन ईश्वर विष्णु ने बोला – ‘हे नारद! मैं तुम्हें प्रत्यक्ष देखा सत्य वृत्तांत सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- बहुत पहले मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी. वह सदा व्रत-उपवास किया करती थी. एक बार वह एक मास तक उपवास करती रही, इससे उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया. वह अत्यंत बुद्धिमान थी. फिर उसने कभी भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के निमित्त अन्नादि का दान नहीं किया. मैंने चिंतन किया कि इस ब्राह्मणी ने उपवास आदि से अपना शरीर तो पवित्र कर लिया है तथा इसको वैकुंठ लोक भी प्राप्त हो जाएगा, किंतु इसने कभी अन्नदान नहीं किया है, अन्न के बिना जीव की तृप्ति होना मुश्किल है. ऐसा चिंतन कर मैं मृत्युलोक में गया और उस ब्राह्मणी से अन्न की भिक्षा मांगी. इस पर उस ब्राह्मणी ने कहा-हे योगीराज! आप यहां किसलिए पधारे हैं? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए. इस पर उसने मुझे एक मिट्टी का पिंड दे दिया. मैं उस पिंड को लेकर स्वर्ग लौट आया. कुछ समय व्यतीत होने पर वह ब्राह्मणी शरीर त्यागकर स्वर्ग आई.

मिट्टी के पिंड के असर से उसे उस स्थान एक आम वृक्ष सहित घर मिला, किंतु उसने उस घर को अन्य वस्तुओं से खाली पाया. वह घबराई हुई मेरे पास आई और बोली – ‘हे प्रभु! मैंने अनेक व्रत आदि से आपका पूजन किया है, किंतु फिर भी मेरा घर वस्तुओं से रिक्त है, इसका क्या कारण है?’

मैंने बोला – ‘तुम अपने घर जाओ और जब देव-स्त्रियां तुम्हें देखने आएं, तब तुम उनसे षटतिला एकादशी व्रत का माहात्म्य और उसका विधान पूछना, जब तक वह न बताएं, तब तक द्वार नहीं खोलना.
प्रभु के ऐसे वचन सुन वह अपने घर गई और जब देव-स्त्रियां आईं और द्वार खोलने के लिए कहने लगीं, तब उस ब्राह्मणी ने बोला – ‘यदि आप मुझे देखने आई हैं तो पहले मुझे षटतिला एकादशी का माहात्म्य बताएं.
तब उनमें से एक देव-स्त्री ने बोला – ‘यदि तुम्हारी यही ख़्वाहिश है तो ध्यानपूर्वक श्रवण करो- मैं तुमसे एकादशी व्रत और उसका माहात्म्य विधान सहित कहती हूं.

जव उस देव-स्त्री ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना दिया, तब उस ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिया. देव-स्त्रियों ने ब्राह्मणी को सब महिलाओं से अलग पाया. उस ब्राह्मणी ने भी देव-स्त्रियों के कहे मुताबिक षटतिला एकादशी का उपवास किया और उसके असर से उसका घर धन्य-धान्य से भर गया, अतः हे पार्थ! मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी का उपवास करना चाहिए. इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है. इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं.

विष्णु जी की आरती 
ओम जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे.
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ओम जय जगदीश हरे.
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का. स्वामी दुःख विनसे मन का.
सुख संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ओम जय जगदीश हरे.
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी. स्वामी शरण गहूं मैं किसकी.
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ओम जय जगदीश हरे.
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी.
स्वामी तुम अन्तर्यामी. पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ओम जय जगदीश हरे.
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता. स्वामी तुम पालनकर्ता.
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ओम जय जगदीश हरे.
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति. स्वामी सबके प्राणपति.
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ओम जय जगदीश हरे.
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे. स्वामी तुम ठाकुर मेरे.
अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ओम जय जगदीश हरे.
विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा. स्वामी पाप हरो देवा.
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, संतन की सेवा॥ ओम जय जगदीश हरे.
श्री जगदीश जी की आरती, जो कोई नर गावे. स्वामी जो कोई नर गावे.
कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ ओम जय जगदीश हरे.

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