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जीन्‍स के अलावा इन फैक्‍टर्स से तय होता है बच्‍चों का कद

एक जरूरी खोज में वैज्ञानिकों ने देखा कि पर्यावरण के तत्व यूरोपीय राष्ट्रों की तुलना में निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों (LMICs) में बच्चों के कद को अधिक बुरी तरह से प्रभावित करते हैं जबकि यूरोपीय राष्ट्रों में जेनेटिक पहलू बच्चों के कद पर अधिक असर डालते हैंइस बात को हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलिक्युलर बायोलॉजी तथा अन्य कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने अपने अध्ययन में समझाया है हाल ही में यह अध्ययन नेचर कम्युनिकेशंस के जर्नल में छपा था

मनुष्य का कद स्थाई जेनेटिक और बदलते पर्यावरण के तत्वों से प्रभावित होता है, इस अध्ययन के लेखकों ने कहा कि तत्व जैसे लाइफस्‍टाइल, खान-पान और वातावरण जीन्स के काम करने के ढंग पर असर डालते हैं एपीजेनेटिक परिवर्तन जिन रेगुलेशन और जीन एक्सप्रेशन को बदल देते हैं लेकिन DNA सीक्वेंस पर इसका कोई असर नहीं होता

माना जाता है कि सामाजिक-आर्थिक स्तर, पोषण और संक्रमण जैसे वातावरण के तत्व बच्चों के विकास पर गहरा असर डालते हैं विशेष रूप से उनके कद पर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन 2021 के अनुमानों को देखा जाए तो छोटे कद के अधिकतर बच्चे LMICs में पाए जाते हैं, विशेष रूप से दक्षिण एशिया और अफ्रीका के शहर क्षेत्र में जहां कम पोषण और उससे जुड़ी समस्याएं अमीर राष्ट्रों ( HIC) की तुलना में कहीं ज्‍यादा हैं अध्ययन में दावा किया गया की इन कारणों से NMICs और अधिक आय वाले राष्ट्रों के बीच कद में अंतर जेनेटिक कारकों के अतिरिक्त अन्‍य कारकों से भी होता है

हालांकि, बचपन के आरंभ में ही पर्यावरण के तत्वों के संपर्क में आने से उसका गहरा असर लंबे समय तक रहता है निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों में बच्चों के कद को लेकर कोई जीनोम आधारित एपीजेनेटिक अध्ययन नहीं हुआ है DNA मैथिलेशन और हिस्टोन परिवर्तन जीन एक्सप्रेशन पर असर डाल सकते हैं सेल रसायनिक प्रक्रिया मैथिलेशन द्वारा DNA मॉलिक्यूल में परिवर्तन करके जीन एक्सप्रेशन को नियंत्रित करता है यह खाने, दवाइयां, तनाव, केमिकल और विषैले तत्वों से संपर्क जैसे वातावरण के तत्वों से प्रभावित होता है

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एपीजीनोम–वाइड एसोसिएशन एनालिसिस और जीनोम–वाइड एसोसिएशन पर अध्ययन से DNA मैथिलेशन और जेनेटिक अंतर में संबंध की जानकारी खोजी इस अध्ययन के लिए 5 बच्चों का समूह बनाया गया जिसमें से तीन हिंदुस्तान से थे एक गांबिया और एक अन्य यूनाइटेड किंगडम से था

वैज्ञानिकों को SOCS3 जीन और उन बच्चों के कद में संबंध मिला जो निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों से थे यह असर उच्च आय वाले राष्ट्र के बच्चे में भी दिखा लेकिन इसका असर बहुत ही कम था कुल मिलाकर इस अध्ययन में पाया गया कि गरीब राष्ट्रों में जीनोम वाइड DNA मिथाइलेशन एसोसिएशन का बच्चों के कद से गहरा संबंध है मजे की बात यह है कि, 12000 जेनेटिक वेरिएंट जिनकी हमें जानकारी है, हिंदुस्तानियों में कद से संबंधित है लेकिन उनका असर यूरोपीय और अमेरिकी राष्ट्र के लोगों पर कम है

डॉ गिरिराज चंदक और CCMB के फेलो सर जे सी बोस के अनुसार, यूरोपीय और भारतीय लोगों में जेनेटिक रिस्क वेरिएशन एक समान होता है किंतु इसके असर का स्तर दोनों के वंश के आधार पर भिन्न-भिन्न होता है हालांकि, NMIC में रह रहे बच्चों के जेनेटिक रिस्क में वातावरण के तत्वों की वजह से परिवर्तन संभव है उन्होंने कहा कि, निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों जैसे हिंदुस्तान के बच्चों के एपिजेनेटिक प्रक्रिया पर असर डालने वाले पर्यावरण के तत्व अलग हैं, इसलिए यूरोपीय एपीजेनेटिक नियंत्रण पर इसका कोई असर नहीं पड़ता

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