30 की उम्र में ऐसे करें अपने त्वचा की देखभाल, बना रहेगा ग्लो और कसाव

30 की उम्र में ऐसे करें अपने त्वचा की देखभाल, बना रहेगा ग्लो और कसाव

उम्र का 30वां पड़ाव वह दौर होता है, जब मेटाबॉलिज्म का धीमा होना शुरू हो जाता है और त्वचा की कोशिकाएं ढीली पड़ने लगती हैं। युवावस्था में जानकारी न होने के कारण त्वचा को धूप से जो नुकसान पहुंचता है, उसका परिणाम अब त्वचा के लटकने और धब्बों के रूप में सामने आ सकता है। सर्दियों में ऐसी त्वचा का खासतौर से खयाल रखना जरूरी होता है।

कैसे करें सौंदर्य की देखभाल

1. स्किन केयर का सबसे जरूरी स्टेप क्लींजिंग, टोनिंग और मॉयस्चराइजिंग इस उम्र में भी जारी रखें।

2. आराम करें। खूब नींद लें। नींद के दौरान 'स्किन रिन्युअल सिस्टम' पूरी तरह एक्टिव रहता है। सोने के रुटीन को जहां तक संभव हो, बनाए रखें। लगातार कई रातों तक देर रात सोने के कारण आंखें सूज जाती हैं। उनके नीचे 'बैग्स' व काले सर्कल उभर सकते हैं।

3. रोज़ाना एक्सरसाइज करने से न सिर्फ मेटाबॉलिज्म में तेजी आएगी, बल्कि स्किन में ब्लड सर्कुलेशन भी तेज होगा, जिससे स्किन को जरूरी न्यूट्रिशन मिलते हैं। स्ट्रेंथ एक्सरसाइज करने से मसल टोन होती हैं, जिससे त्वचा का कसाव बना रहता है।

4. मेडिटेशन और रिलैक्सेशन थेरेपीज आजमाएं। लंबे समय से चला आ रहा तनाव त्वचा को कई तरह से प्रभावित करता है। तनाव की वजह से शरीर में कॉर्टिसॉल नामक हार्मोन का स्राव होता है और इसके कारण रक्त, ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति त्वचा के बजाय उन नाजुक अंगों में होने लगती है, जो तनाव से निपटने के लिए काम करते हैं। इस तरह त्वचा को पर्याप्त मात्रा में खून, पोषण व ऑक्सीजन न मिलने के कारण वह बेजान-सी हो जाती है। उसकी रंगत फीकी पड़ जाती है और लचीलापन कम हो जाता है। इस कारण त्वचा के छिद्र बंद हो जाते हैं और कील-मुंहासे होने की संभावना बढ़ जाती है।5. त्वचा जवां दिखे इसके लिए महीने में एक बार केमिकल/ग्लाईकोलिक पील कराएं। इससे त्वचा की मृत कोशिकाओं की ऊपरी परत हट जाती है और नीचे की नई त्वचा नजर आने लगेगी।


इस दिन मांं करें निर्जला उपवास, संतान को मिलेगा लंबी उम्र का वरदान

इस दिन मांं करें निर्जला उपवास, संतान को मिलेगा लंबी उम्र का वरदान

माघ मास के गणेश चतुर्थी व्रत का बहुत महत्व है। वैसे तो हर महीने दो गणेश चतुर्थी आती हैं, लेकिन माघ माह में चतुर्थी को बहुत खास माना गया है। माघ महीने के गणेश चतुर्थी को सकट, तिलवा  और तिलकुटा चौथ का व्रत कहते है।  इस बार सकट व्रत का पूजन 31 जनवरी यानि कि दिन रविवार  को होगा। ये व्रत महिलाएं संतान की लंबी आयु के लिए करती है। पहले ये व्रत पुत्र के लिए किया जाता रहा है, लेकिन अब बेटियों के लिए भी व्रत किया जाने लगा है।

मुहूर्त
पंचाग के अनुसार , पंचांग के अनुसार 31 जनवरी 2021 को  08:24 रात को चतुर्थी तिथि शुरू होगी और 01 फरवरी 202 1 को  शाम 06:24 बजे समाप्त होगी।

वक्रतुंडी चतुर्थी, माघी चौथ अथवा तिलकुटा चौथ भी इसी को कहते हैं। सूर्योदय से पूर्व स्नान के बाद उत्तर दिशा की ओर मुंह कर गणेश जी को नदी में 21 बार, तो घर में एक बार जल देना चाहिए। सकट चौथ संतान की लंबी आयु हेतु किया जाता है। चतुर्थी के दिन मूली नहीं खानी चाहिए, धन-हानि की आशंका होती है। देर शाम चंद्रोदय के समय व्रती को तिल, गुड़ आदि का अर्घ्य चंद्रमा, गणेश जी और चतुर्थी माता को अवश्य देना चाहिए। अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है। इस दिन स्त्रियां निर्जल व्रत करती हैं। सूर्यास्त से पहले गणेश संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा-पूजा होती है। इस दिन तिल का प्रसाद खाना चाहिए। दूर्वा, शमी, बेलपत्र और गुड़ में बने तिल के लड्डू चढ़ाने चाहिए।

कैसे करते है व्रत?
* कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।
*  इस दिन गणपति का पूजन किया जाता है।
*  महिलाएं निर्जल रहकर व्रत रखती हैं।
* शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
* ये व्रत करने से  दु:ख दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं

क्या है महत्व?
* 12 मास में आने वाली चतुर्थी  में माघ की चतुर्थी का सबसे अधिक महत्व है।
* पुराणों के अनुसार, गणेश जी ने इस दिन शिव- पार्वती की परिक्रमा की थी।
* परिक्रमा कर माता-पिता से श्रीगणेश ने प्रथम पूज्य का आशीर्वाद का पाया था।
* इस दिन 108 बार ‘ ऊँ गणपतये नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए।
*  तिल और गुड़ का लड्डू श्री गणेश को चढ़ाने से रुके काम बनते हैं।
*  इस दिन गणेश के साथ शिव और कार्तिकेय की भी पूजा कर कथा सुनी जाती है।
 

सत्ययुग में महाराज हरिश्चंद्र के नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन बनाकर आंवा लगाया, पर आवां पका ही नहीं। बार-बार बर्तन कच्चे रह गए। बार-बार नुकसान होते देख उसने एक तांत्रिक से पूछा, तो उसने कहा कि बलि से ही तुम्हारा काम बनेगा। तब उसने तपस्वी ऋषि शर्मा की मृत्यु से बेसहारा हुए उनके पुत्र की सकट चौथ के दिन बलि दे दी।

उस लड़के की माता ने उस दिन गणेश पूजा की थी। बहुत तलाशने पर जब पुत्र नहीं मिला, तो मां ने भगवान गणेश से प्रार्थना की। सवेरे कुम्हार ने देखा कि वृद्धा का पुत्र तो जीवित था। डर कर कुम्हार ने राजा के सामने अपना पाप स्वीकार किया। राजा ने वृद्धा से इस चमत्कार का रहस्य पूछा, तो उसने गणेश पूजा के विषय में बताया। तब राजा ने सकट चौथ की महिमा को मानते हुए पूरे नगर में गणेश पूजा करने का आदेश दिया। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकट हारिणी माना जाता है।


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