लाइफ स्टाइल

बाजारों में फागणिया साडि़यों की बढ़ी डिमांड

 होली का उल्लास और मस्ती हर तरफ छायी हुई है रंग-गुलाल के साथ अब डिजाइनर के जमाने में होली पर भी नये कपड़े पहने जाने लगे हैं रंग रंगीलो राजस्थान में फागण साड़ी पहनी जाती है ये अपने प्रदेश की संस्कृति की तरह चटख रंगों की होती है इस मौसम में इस साड़ी की काफी डिमांड रहती है

फागुन मास की शुरूआत के साथ ही राजस्थान की स्त्रियों में काफी उत्साह रहता है होली के लिए यहां खास तैयारी की जाती है रंग गुलाल और पकवान के साथ फाग गाने की परंपरा यहां है स्त्रियों की टोली घर घर घूमकर फागुन की शुभकामना देती हैं फागुन के मौसम में वो खास साड़ी पहनना पसंद करती है जिसे फागण साड़ी बोला जाता है पूरे राजस्थान सहित जोधपुर के त्रिपोलिया बाजार में मिलन साड़ी से लेकर बी रोड स्थित शुभ साड़ी तक हर स्थान ये साड़ियां मौजूद हैं स्त्रियों की भारी भीड़ यहां उमड़ रही है

फागुणिया की 100 वैरायटी
इस बार बाजार में फागुणिया साड़ी की 100 से अधिक वैरायटी हैं स्त्रियों को काफी पसंद आ रही है मारवाड़ की परंपरा के मुताबिक फागुन में फागणिया पहनने का रिवाज है महिलाएं सफेद-लाल और पीले रंग की साड़ी में नजर आने लगी हैं शहर के बाजारों में विशेष रूप से सफेद, लाल, पीले रंग की साड़ी और राजपूती पोशाकें सज चुकी हैं

300 से लेकर 3000 तक
मेवाड़ की परंपरा रही है कि महिलाएं होली के अवसर पर पीले, सफेद और लाल रंग की पीलिया और फागणिया ड्रेस पहनती हैं बेटी के पहला बच्चा होने पर ढूंढ़ के मौके पर पीहर से ससुराल पीलिया या फागणिया साड़ी भेजी जाती है, जो माता-पिता की तरफ से शुभकामनाओं का प्रतीक होती है इस बार त्रिपोलिया बाजार में मिलन साड़ी पर में कई तरह की नयी डिजाइन की साड़ियां मौजूद हैं इसमें गोटा पत्ती हैंड वर्क, सिल्क साटन के साथ ही 300 से लेकर 3,000 रुपए तक की सुन्दर डिजाइन की साड़ियां यहां मिल जाएंगी

पीहर का पीला, बुआ की बुरलिया-ओढ़नी
राजस्थान में वस्त्र-प्रसंग में यह बात विशेष रूप से याद आती है कि यहां मौसम के अनुसार वस्त्र पहने जाते हैं दो सौ वर्ष पहले लिखी “कपड़ कुतूहल” में इस मान्यता पर बल है कि रुचि की अनुकूलता पर ऋतु का असर होता है फागुन में फबते फागणिया परिधान को ओढ़ने की परंपरा है ऐसा माना जाता ह जब तक बहू पर सासरे का रंग पूरा न चढ़ जाए, तब तक तरह-तरह के रंग चढ़ाए जाते हैं पीहर का पीला, मामैरा का कोरजल्या, बुआ की बुरलिया-ओढ़नी, जेठाणी का जेठा वेश और ननद का ननदिया नांदना, भतीजा-भतीजी होने पर ढूंढ की रस्म का रुचिकर वेश भी यही है

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