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पाकिस्तान में भी मौजूद हैं मां दुर्गा के ये चमत्कारी मंदिर

राजस्थान न्यूज डेस्क !!! मां दुर्गा की पूजा के लिए नवरात्रि के नौ दिन शुभ माने जाते हैं. इस दौरान मां शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री माता तक की पूजा की जाती है. दुर्गा नवमी के दिन हवन और विसर्जन के साथ समाप्ति होता है. देवी भागवत पुराण के मुताबिक मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठ हैं. नवरात्रि के दौरान हिंदुस्तान में स्थापित शक्तिपीठों पर माता के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है. आइए जानते हैं मां दुर्गा के 9 शक्तिपीठों और उनसे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में.

शक्तिपीठ से जुड़ी कथा

माता शक्तिपीठ से जुड़ी कथा पुराणों में भी वर्णित है. पौराणिक कथा के मुताबिक दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के मृत शरीर को लेकर ईश्वर शिव ने पृथ्वी पर तांडव करना प्रारम्भ कर दिया. तब ईश्वर विष्णु ने शिवजी का क्रोध शांत करने के लिए सती के मृत शरीर को सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिया. इस क्रम में सती के शरीर के अंग और आभूषण जहां-जहां गिरे, वे जगह शक्तिपीठ कहलाये.

माँ दुर्गा के प्रमुख 9 शक्तिपीठ

  • 1. कालीघाट मंदिर कोलकाता – चार उंगलियाँ गिरीं
  • 2. कोलापुर महालक्ष्मी मंदिर- त्रिनेत्र गिरा
  • 3. अम्बाजी का मंदिर गुजरात- दिल गिरा
  • 4. नैना देवी मंदिर – नजरों का गिरना
  • 5. कामाख्या देवी मंदिर- यहां गुप्तांग गिरा था
  • 6. हरसिद्धि माता मंदिर उज्जैन यहां बायां हाथ और होंठ गिरे थे
  • 7. ज्वाला देवी मंदिर सती की जीभ गिरी थी
  • 8. कालीघाट में माता के बाएं पैर की अंगुली गिरी थी.
  • 9. वाराणसी- यूपी के काशी में मणिकर्णिक घाट पर विशालाक्षी की माता की मनके बाली गिरी थी.

अमर उजाला राजस्थान में दुर्गा मां के 9 मंदिरों के दर्शन करा रहा है – शक्तिपीठों से लेकर अग्नि स्नान करने वाली देवी और चूहों की मां तक.

1. त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ मंदिर, बांसवाड़ा

दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी बहुल जिले बांसवाड़ा में 52 शक्तिपीठों में से एक सिद्ध माता श्री त्रिपुर सुंदरी का शक्तिपीठ मंदिर है. मान्यता है कि मंदिर में मांगी गई मन्नतें देवी पूरी करती हैं, यही कारण है कि आम लोगों से लेकर नेता तक मां के दरबार में पहुंचते हैं और हाजिरी लगाते हैं

बांसवाड़ा जिले से 18 किमी दूर तलवाड़ा गांव में अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य माता त्रिपुरा सुंदरी का भव्य मंदिर है. मुख्य मंदिर के दरवाजे चांदी के बने हैं. मां भगवती त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति अष्टादश यानी 18 भुजाओं वाली है. मूर्ति में देवी दुर्गा के 9 रूपों की प्रतिकृतियां हैं. मां सिंह, मयूर और कमल आसन पर बैठे हैं. नवरात्रि के दौरान त्रिपुर सुंदरी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जिससे मेले जैसा माहौल बन जाता है.

यहां तक ​​कि पीएम, मुख्यमंत्री भी शामिल होते हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समेत कई अन्य नेता, सांसद, विधायक, मंत्री ने मंदिर में दर्शन किये माता हैं बांसवाड़ा में चुनावी रैलियों की आरंभ नेताओं द्वारा माता के मंदिर में दर्शन करने के बाद की जाती है

गुजरात, मालवा और मारवाड़ के शासक त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ के उपासक थे

इस मंदिर के उत्तरी भाग में सम्राट कनिष्क के समय का एक शिवलिंग है. ऐसा माना जाता है कि यह जगह कनिष्क-पूर्व काल से ही मशहूर रहा होगा. वहीं, कुछ विद्वान यहां देवी मां के शक्तिपीठ का अस्तित्व तीसरी शताब्दी से पहले का मानते हैं. उनका बोलना है कि पहले यहां ‘गढ़पोली’ नामक ऐतिहासिक नगर था. ‘गढ़पोली’ का अर्थ है-दुर्गापुर ऐसा माना जाता है कि गुजरात, मालवा और मारवाड़ के शासक त्रिपुर सुंदरी के उपासक थे.

2. कैला देवी मंदिर, शक्तिपीठ, करौली

करौली जिले में कैला देवी मंदिर सौ वर्ष पुराना मंदिर है. इस प्राचीन मंदिर में चांदी की चौकी पर सुनहरे छतरियों के नीचे दो मूर्तियाँ हैं. एक बाईं ओर है, उसका मुंह थोड़ा टेढ़ा है, यानी कैला मैया है, दूसरी दाईं ओर माता चामुंडा देवी की छवि है. कैला देवी की आठ भुजाएं हैं. यह मंदिर उत्तर हिंदुस्तान के प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में मशहूर है. इस मंदिर से जुड़ी कई कहानियां यहां प्रचलित हैं.

मान्यता है कि कंस ईश्वर कृष्ण के पिता वासुदेव और देवकी को कैद करके जिस पुत्री योगमाया को मारना चाहता था, वह योगमाया कैला देवी के रूप में इस मंदिर में विराजमान है. मंदिर के पास स्थित कालीसिल नदी को चमत्कारी नदी भी बोला जाता है. कैला देवी मंदिर करौली जिले से 30 किमी और हिंडौन रेलवे स्टेशन से 56 किमी दूर है. नवरात्रि के दौरान यहां दूर-दूर से श्रद्धालु माता के मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं.

3. श्री करणी माता मंदिर, देशनोक, बीकानेर

पश्चिमी राजस्थान में बीकानेर के देशनोक में करणी माता का मशहूर मंदिर है. इस मंदिर में बड़ी संख्या में चूहे रहते हैं इसलिए इसे चूहे वाली माता का मंदिर या चूहे वाला मंदिर भी बोला जाता है. ऐसा माना जाता है कि इनमें से कुछ चूहे सफेद भी होते हैं. मंदिर में सफेद चूहों का दिखना बहुत शुभ माना जाता है. इसे देवी का करिश्मा ही माना जाता है कि इतने सारे चूहों की मौजूदगी के बावजूद आज तक यहां कोई रोग नहीं फैली है. नवरात्रि पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और इच्छा लेकर पहुंचते हैं. देशनोक करणी माता मंदिर संभवत: राष्ट्र का एकमात्र मंदिर है जहां लगभग 20 हजार चूहे भी रहते हैं. सफेद चूहों को मां करणी का वाहक माना जाता है.

माँ करणी बीकानेर राजघराने की कुल देवी हैं

करणी माता बीकानेर राजघराने की देवी हैं. करणी माता के वर्तमान मंदिर का निर्माण बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने करवाया था. चूहों के अतिरिक्त इस मंदिर के मुख्य आकर्षण हैं संगमरमर के मुख्य द्वार पर किया गया उत्कृष्ट काम, मुख्य द्वार पर बना बड़ा चांदी का दरवाजा, मां का स्वर्ण छत्र और चूहों के प्रसाद के लिए रखा गया चांदी का विशाल परात. भक्तों का मानना ​​है कि करणी देवी मां जगदंबा का अवतार थीं.

जिस जगह पर यह भव्य मंदिर स्थित है, लगभग 650 साल पूर्व माता ने एक गुफा में रहकर अपने आराध्य की आराधना की थी. यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है. जब माता की मौत हो गई तो उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक उनकी मूर्ति इस गुफा में स्थापित की गई. बोला जाता है कि बीकानेर और जोधपुर राज्य की स्थापना मां करणी के आशीर्वाद से हुई थी. यह मशहूर मंदिर बीकानेर रेलवे स्टेशन से लगभग 30 किलोमीटर दूर है. यहां सड़क और रेल मार्ग द्वारा सरलता से पहुंचा जा सकता है.

4. श्री शिला माता मंदिर, आमेर

जयपुर के राजपरिवार के कछवाहा वंश की आराध्य देवी शिला माता आजादी के बाद जयपुरवासियों की प्रमुख शक्तिपीठ है. इस मंदिर की महिमा बहुत है और इसे चमत्कारी भी बोला जाता है. यह तंत्र साधकों और साधकों के बीच भी मशहूर है. जयपुर की स्थापना से पहले यहां आमेर रियासत थी, जहां के प्रतापी शासक राजा मानसिंह प्रथम ने शिला माता के आशीर्वाद से मुगल शासक अकबर के प्रधान सेनापति के रूप में 80 से अधिक युद्ध जीते थे. आजादी से पहले आमेर महल परिसर में स्थित शिला माता मंदिर के दर्शन सिर्फ़ राजपरिवार के सदस्य और प्रमुख सामंत ही कर पाते थे, अब रोजाना सैकड़ों श्रद्धालु माता के दर्शन करते हैं.

नवरात्रि में माता के दर्शन के लिए लंबी कतारें लगती हैं और छठ के दिन मेला लगता है. जयपुर के प्राचीन प्रमुख मंदिरों में से एक इस शक्तिपीठ को पंद्रहवीं शताब्दी में आमेर के तत्कालीन शासक राजा मानसिंह प्रथम ने प्रतिस्थापित किया था. मंदिर का मुख्य द्वार चांदी से बना है. इस पर नवदुर्गा शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री अंकित हैं. काली, तारा, षोडशी, भुनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरा, भैरवी, धूमावती, बगुलामुखी, मातंगी और कमला को दस महाविद्याओं के रूप में दर्शाया गया है. दरवाजे के ऊपर गणेश की लाल पत्थर की मूर्ति है. दरवाजे के सामने चांदी का नग्गर रखा जाता है. प्रवेश द्वार के पास दाहिनी ओर महालक्ष्मी और बायीं ओर महाकाली की नक्काशीदार आकृतियाँ हैं.

शिला के रूप में पाए जाने के कारण इन्हें शिलादेवी बोला गया

धार्मिक मान्यता है कि शिला माता की छवि एक चट्टान के रूप में मिली थी. 1580 ई में आमेर के शासक राजा मानसिंह बंगाल के जसोर साम्राज्य पर अपनी विजय के बाद इस पत्थर को वहां से आमेर ले आये. यहां प्रमुख कलाकारों द्वारा महिषासुर को माता के रूप में उकेरा गया था. इस बारे में जयपुर में एक कहावत भी बहुत प्रचलित है- सांगानेर को बताओ पिता हनुमान जयपुर को, शिला देवी आमेर की राजा हैं.

5. श्री चामुंडा माता मंदिर, मेहरानगढ़, जोधपुर

जोधपुर में चामुंडा माता मंदिर शाही परिवार की ईष्ट देवी का मंदिर है. यह मेहरानगढ़ किले के दक्षिणी भाग में स्थित है. जोधपुर शहर के संस्थापक राव जोधा ने 1460 में मंडोर की पुरानी राजधानी से अपनी प्रिय देवी चामुंडा की एक मूर्ति खरीदी थी. उन्होंने मेहरानगढ़ किले में चामुंडा देवी की मूर्ति स्थापित की और तभी से चामुंडा यहां की देवी बन गईं. दशहरे के दौरान जोधपुर शहर के बाहर और अंदर के लोगों द्वारा पूजा की जाने वाली यह किला लोगों और भक्तों से भर जाता है.

देवी चामुंडा राजपूतों की प्रमुख देवी हैं

जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में स्थित इस मंदिर का निर्माण राव जोधा ने उस समय करवाया था जब वह किले का निर्माण करा रहे थे. जिस पहाड़ी पर उन्होंने यह किला बनाने के लिए चुना, उसे हरमीत भट्ट ने अधिकृत किया था. जब उन्हें वहां से निकाला गया तो उन्होंने राजा को श्राप दिया कि उनके किले में हमेशा पानी की कमी रहेगी संत ने इस श्राप से बचने और लोगों को इससे बचाने के लिए किले के अंदर चामुंडा माता का मंदिर बनवाया और तब से देवी चामुंडा राजपूतों की प्रमुख देवी रही हैं.

6. श्री जीण माता मंदिर, सीकर

शेखावाटी क्षेत्र के सीकर जिले में स्थित जीण माता मंदिर लोगों के बीच बहुत मशहूर मंदिर है. नवरात्रि के दौरान यहां बहुत बड़ा मेला लगता है. शेखावाटी क्षेत्र में सीकर-जयपुर मार्ग पर जीणमाता गांव में मां का अति प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यह मंदिर न केवल खूबसूरत जंगल के बीच बना है बल्कि तीन छोटी पहाड़ियों के बीच भी स्थित है. राष्ट्र के प्राचीन शक्तिपीठों में से एक जैन माता मंदिर दक्षिणमुखी है. मंदिर की दीवारों पर तांत्रिकों की मूर्तियाँ हैं जिससे पता चलता है कि यह तांत्रिकों की साधना का केंद्र रहा होगा. मंदिर के अंदर जैन भगवती की अष्टकोणीय मूर्ति है. पर्वत के नीचे बने मंडप को गुफा बोला जाता है.

मान्यताओं के मुताबिक जीण माता का जन्म राजस्थान के चुरू के घांघू गांव के एक शाही परिवार में हुआ था. उन्हें माँ शक्ति का अवतार माना जाता है और उनके बड़े भाई हर्ष को ईश्वर शिव का अवतार बोला जाता है. कथाओं के मुताबिक एक बार दोनों भाई-बहनों के बीच टकराव हो गया और माता इसी जगह पर आकर तपस्या करने लगीं.

अपनी बहन की हार से चिंतित भाई हर्ष भी उसके पीछे-पीछे यहां पहुंच गया और उसने अपनी बहन को समझाने की पूरी प्रयास की, लेकिन उसे निराशा हाथ लगी जिसके बाद उन्होंने भी पास के एक जगह पर तपस्या प्रारम्भ कर दी. इस जगह पर अपरावली की पहाड़ियों के बीच हर्षनाथ का मंदिर है. जब मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना ने शेखावाटी के मंदिरों को तोड़ना प्रारम्भ किया तो लोगों ने माता जीणमाता से प्रार्थना की.

माँ ने अपने करिश्मा से मधुमक्खियों की एक विशाल सेना औरंगजेब की सेना पर छोड़ दी. ऐसा माना जाता है कि जब औरंगजेब के सैनिक लहूलुहान होकर भाग गए तो औरंगजेब ने माता से माफी मांगी और मंदिर में अखंड दीपक के लिए ऑयल भेजने का वादा किया. जिसके बाद दीपक के लिए ऑयल की प्रबंध दिल्ली और फिर जयपुर से की जाती रही. इस करिश्मा के बाद जिनमाता को भंवरों की देवी बोला जाने लगा.

7. अर्बुदा देवी मंदिर, शक्तिपीठ, माउंट आबू

अर्बुदा देवी मंदिर राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है. अर्बुदा देवी मंदिर को अधर देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर राजस्थान के माउंट आबू से 3 किमी दूर है. दूर पहाड़ी पर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि यहां मन देवी पार्वती के होंठ गिरे थे, इसलिए यहां शक्तिपीठ स्थापित हुआ. यहां मां अर्बुदा देवी को माता कात्यायनी देवी के रूप में पूजा जाता है, क्योंकि अर्बुदा देवी को मां कात्यायनी का ही रूप बोला जाता है. यहां वर्ष भर भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है.

देवी और पादुका के दर्शन से मोक्ष की प्राप्ति होती है

कहा जाता है कि यहां देवी के दर्शन मात्र से ही भक्तों को मोक्ष मिल जाता है. भक्त सैकड़ों मीटर का यात्रा तय करके और करीब 350 सीढ़ियां चढ़कर यहां मां के दर्शन के लिए आते हैं. यह मंदिर एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है. गुफा के अंदर एक दीपक लगातार जलता रहता है और उसकी रोशनी से भगवती के दर्शन होते हैं. मंदिर की स्थापना साढ़े 5 हजार वर्ष पहले हुई थी. ऐसा माना जाता है कि माता के दर्शन मात्र से ही आदमी को सभी दुखों से मुक्ति मिल जाती है और भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. मंदिर में अर्बुदा देवी का चरण पादुका मंदिर भी स्थित है. उन्होंने माता की चरण पादुका के नीचे बासकली नामक राक्षस का वध किया. माँ कात्यायनी के बासकली वध की कथा पुराणों में मिलती है.

8. ईडाणा माता मंदिर, उदयपुर

राजस्थान के गौरवशाली मेवाड़ के सबसे प्रमुख शक्तिपीठों में से एक ईडाणा माता मंदिर में माता प्रसन्न होने पर स्वयं अग्नि स्नान करती हैं. यह मंदिर उदयपुर शहर से 60 किमी दूर कुराबड़-बम्बोरा मार्ग पर विशाल अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित है. ईडाणा माता राजपूत समाज, भील ​​आदिवासी समाज सहित पूरे मेवाड़ की आराध्य माता हैं. माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महाभारत काल में हुआ था. कई रहस्यों को समेटे इस मंदिर में नवरात्रि के दौरान भक्तों की भीड़ उमड़ती है.

मेरी मां रहस्यमय ढंग से स्वयं को अग्नि से स्नान कराती हैं

ईडाणा माता के अग्नि स्नान को देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं. अग्नि स्नान की एक झलक पाने के लिए भक्त घंटों प्रतीक्षा करते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस समय भक्तों को देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है. प्राचीन काल में यहां के राजा ईडाणा माता को अपनी देवी के रूप में पूजते रहे हैं. यहां दूर-दूर से श्रद्धालु और पर्यटक दर्शन के लिए आते हैं.

9. श्री कृष्णाई अन्नपूर्णा माताजी मंदिर, बारां

यह मंदिर बारां से लगभग 40 किमी दूर रामगढ़ की पहाड़ी पर है. मशहूर रामगढ़ क्रेटर का बड़ा क्रेटर भी इसके पास ही है, जो कभी उल्कापिंड गिरने से बना था. मंदिर के दर्शन के लिए 900 सीढ़ियाँ चढ़कर जाना होता है, जो घुमावदार हैं. जो जमीनी स्तर से 1000 फीट की ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर स्थित है. मान्यता है कि माता स्वयं एक गुफा से प्रकट हुई थीं. यहां मां दुर्गा कन्या रूप में हैं. नवरात्रि में कन्या पूजन या कंजके पूजन का बहुत महत्व माना जाता है. इस मंदिर का निर्माण जयपुर और कोटा रियासत के बीच हुए युद्ध के बाद हुआ था. नवरात्र पर लोग दूर-दूर से मंदिर में दर्शन के लिए आ रहे हैं.

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