जगन की विरासत के सच्चे वाहक का निधन

जगन की विरासत के सच्चे वाहक का निधन
भाजपा नेता अशोक शर्मा के मृत्यु से पूर्वी राजस्थान में ब्राह्मण समाज के लिए एक युग का अंत हो गया है. यूं तो पिता और पूर्व मंत्री बनवारी लाल शर्मा की वजह से  जाना जाता था, लेकिन अशोक शर्मा ने अपनी स्वयं की पहचान गढ़ी और अपने दादा जगन की विरासत के सच्चे वाहक के तौर पर ब्राह्मण समाज के संरक्षक बने. 

अशोक शर्मा करीब 63 साल के थे. कांग्रेस पार्टी के जिलाध्यक्ष रहे हैं. 2008 में कांग्रेस पार्टी और 2018 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और हारे. पूर्व मंत्री बनवारीलाल शर्मा के सबसे बड़े बेटे अशोक शर्मा ने पुरुष कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष के तौर पर 1984 में एक्टिव राजनीति में कदम रखा था. 2018 तक शर्मा धौलपुर की राजनीति में एक्टिव रहे. 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी छोड़ शर्मा बीजेपी में शामिल हुए. राजाखेड़ा से प्रत्याशी बने, लेकिन रोहित बोहरा के सामने हार का सामना करना पड़ा. उन्हें वसुंधरा राजे के खेमे का नेता माना जाता था. 

पिता की विरासत को आगे बढ़ाया 
अशोक शर्मा ने साल 2008 से ही धौलपुर में पिता बनवारीलाल शर्मा की विरासत संभाल रखी थी. उनके पिता 2013 के चुनाव और 2017 के उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी प्रत्याशी रहे. चुनाव की पूरी कमान अशोक शर्मा के हाथ में रही. चंबल स्थित मुक्ति धाम में आखिरी संस्कार के लिए बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. इससे नेशनल हाइवे 44 पर जाम लग गया था.  

ग्वालियर तक था परिवार का दबदबा
अशोक शर्मा जगन के पोते थे, जिनके नाम पर जगन भवन आज भी धौलपुर में शान से खड़ा है. जगन परिवार का असर धौलपुर, भिंड, मुरैना, करौली, माधोपुर, दौसा तक फैले ब्राह्मण समाज में था. जगन की पहचान ब्राह्मणों को संरक्षण देने की थी, जिसे अशोक शर्मा ने आगे बढ़ाया. यदि किसी गाड़ी पर जगन लिखा होता था तो उस समय क्षेत्र में एक्टिव डकैत भी उसे रोकने की हौसला नहीं करते थे. 

वसुंधरा भी हारी थी बनवारीलाल से 
पूर्व सीएम और बीजेपी नेता वसुंधरा राजे भी एक समय बनवारीलाल से चुनाव हार चुकी हैं. यह बात अलग है कि वसुंधरा राजे ने 2018 में अशोक शर्मा को बीजेपी में लिया और टिकट भी दिलाया. अशोक शर्मा अपने दादा की शैली पर ही चलते हुए ब्राह्मणों के लिए समर्पित नजर आए.  
 

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भाजपा नेता अशोक शर्मा के मृत्यु से पूर्वी राजस्थान में ब्राह्मण समाज के लिए एक युग का अंत हो गया है. यूं तो पिता और पूर्व मंत्री बनवारी लाल शर्मा की वजह से  जाना जाता था, लेकिन अशोक शर्मा ने अपनी स्वयं की पहचान गढ़ी और अपने दादा जगन की विरासत के सच्चे वाहक के तौर पर ब्राह्मण समाज के संरक्षक बने. 

अशोक शर्मा करीब 63 साल के थे. कांग्रेस पार्टी के जिलाध्यक्ष रहे हैं. 2008 में कांग्रेस पार्टी और 2018 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और हारे. पूर्व मंत्री बनवारीलाल शर्मा के सबसे बड़े बेटे अशोक शर्मा ने पुरुष कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष के तौर पर 1984 में एक्टिव राजनीति में कदम रखा था. 2018 तक शर्मा धौलपुर की राजनीति में एक्टिव रहे. 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी छोड़ शर्मा बीजेपी में शामिल हुए. राजाखेड़ा से प्रत्याशी बने, लेकिन रोहित बोहरा के सामने हार का सामना करना पड़ा. उन्हें वसुंधरा राजे के खेमे का नेता माना जाता था. 

पिता की विरासत को आगे बढ़ाया 

अशोक शर्मा ने साल 2008 से ही धौलपुर में पिता बनवारीलाल शर्मा की विरासत संभाल रखी थी. उनके पिता 2013 के चुनाव और 2017 के उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी प्रत्याशी रहे. चुनाव की पूरी कमान अशोक शर्मा के हाथ में रही. चंबल स्थित मुक्ति धाम में आखिरी संस्कार के लिए बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. इससे नेशनल हाइवे 44 पर जाम लग गया था.  

ग्वालियर तक था परिवार का दबदबा

अशोक शर्मा जगन के पोते थे, जिनके नाम पर जगन भवन आज भी धौलपुर में शान से खड़ा है. जगन परिवार का असर धौलपुर, भिंड, मुरैना, करौली, माधोपुर, दौसा तक फैले ब्राह्मण समाज में था. जगन की पहचान ब्राह्मणों को संरक्षण देने की थी, जिसे अशोक शर्मा ने आगे बढ़ाया. यदि किसी गाड़ी पर जगन लिखा होता था तो उस समय क्षेत्र में एक्टिव डकैत भी उसे रोकने की हौसला नहीं करते थे. 

वसुंधरा भी हारी थी बनवारीलाल से 

पूर्व सीएम और बीजेपी नेता वसुंधरा राजे भी एक समय बनवारीलाल से चुनाव हार चुकी हैं. यह बात अलग है कि वसुंधरा राजे ने 2018 में अशोक शर्मा को बीजेपी में लिया और टिकट भी दिलाया. अशोक शर्मा अपने दादा की शैली पर ही चलते हुए ब्राह्मणों के लिए समर्पित नजर आए.