चीन शैली की शासन व्यवस्था की कर रहे पैरोकारी, पश्चिम के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों को प्रभावित कर रहा ड्रैगन

चीन शैली की शासन व्यवस्था की कर रहे पैरोकारी, पश्चिम के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों को प्रभावित कर रहा ड्रैगन

पश्चिमी उच्च शिक्षण और प्रतिष्ठित संस्थान चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) जैसे सत्तावादी राजनीतिक व्यवस्थाओं का सामान्यीकरण कर रहे हैं, जबकि उन्हें जांच के दायरे में होना चाहिए। न्यूजवीक पत्रिका के लिए लिखने वालीं जार्जिया एल. गिलहोली ने आरोप लगाया कि अमेरिका और ब्रिटेन में बेहद प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों को चीनी हितों के लिए प्रभावित किया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक संस्थानों के गठन के सिद्धांत के पैरोकार पश्चिम के विश्वविद्यालयों ने इस अवधारणा को आगे बढ़ाया है कि चीन शैली के शासन को अन्य देशों द्वारा अपनाया जा सकता है।

मालूम हो कि गिलहोली पिंसकर सेंटर में मीडिया डायरेक्टर और फाउंडेशन फार उइगर फ्रीडम के लिए एडीटर इन चीफ हैं। यह भी तथ्य है कि चीन सरकार और उससे जुड़े कारपोरेशंस इस तथ्य के बावजूद विश्वविद्यालयों के प्रशासकों की अपनी लाबिंग में प्रभावी रहे हैं कि अन्य देशों के लिए चीनी शासन व्यवस्था को अपनाना असंभव हो सकता है। गिलहोली ने आरोप लगाया कि इस संकट का कारण विश्वविद्यालयों का विस्तार और उनका वाणिज्यिकरण है जिसकी वजह से वे विदेशी नकदी पर निर्भर हो गए हैं जबकि ब्रिटेन में शैक्षिक संस्थान सरकारी सहायता प्राप्त हैं।

उन्होंने कहा, 'चीन सरकार शिनजियांग के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के पुनर्शिक्षण शिविरों में 10 से 30 लाख उइगरों और तुर्की के अन्य मुस्लिमों को रखने के लिए जिम्मेदार है जहां उन्हें जबरन श्रम और यौन दु‌र्व्यवहार आदि के लिए मजबूर किया जाता है।' उन्होंने आगे कहा, 'यह स्पष्ट है कि कई शिक्षण संस्थानों के पास बीजिंग की मांगों को लंबित रखने का कोई वित्तीय या नैतिक प्रोत्साहन नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ सीसीपी ही ब्रिटेन की उच्च शिक्षा को प्रभावित कर रही है। शीर्ष के कालेज नियमित तौर पर दमन से जुड़े शासनों और कंपनियों से बड़े दान लेते हैं और यह स्पष्ट है कि ऐसे दान देने के लिए चीन के पास काफी नकदी है।' बता दें कि ऐसे स्तंभकारों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो पश्चिमी दुनिया के प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों में चीनी प्रभाव की आलोचना करते हैं और गिलहोली उनमें से एक हैं।


मिस्र की इतनी साल पुरानी ममी के पेट में 28 महीने का भ्रूण, जानिए अब तक कैसे रहा सुरक्षित?

मिस्र की इतनी साल पुरानी ममी के पेट में 28 महीने का भ्रूण, जानिए अब तक कैसे रहा सुरक्षित?

 मिस्र में एक के पेट से मिले 28 महीने के भ्रूण के रहस्य को सुलझा लिया गया है। यह भ्रूण पिछले 2000 साल से ममी के पेट में सुरक्षित था। 2021 में खोज के बाद से ही यह वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बना हुआ था। अब बताया गया है कि महिला के शरीर के विघटित होने के बाद इस भ्रूण को अम्लीकरण के जरिए सुरक्षित रखा गया था। यह प्रक्रिया ठीक ऐसी है, जैसे किसी अचार को सुरक्षित रखा जाता है। वारसॉ विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की टीम ने पिछले साल अप्रैल में सीटी और एक्स-रे स्कैन के जरिए अजन्मे बच्चे के अवशेषों की उपस्थिति का

खुलासा किया था।माना जाता है कि यह दुनिया के सबसे पुराना भ्रूण है। इस भ्रूण को मिस्र से आज से करीब 200 साल पहले पोलैंड लेकर जाया गया था। दिसंबर 1826 में इस ममी को वारसॉ विश्वविद्यालय को दान में दिया गया था। तब माना जा रहा था कि यह ममी एक महिला की है लेकिन 1920 के दशक में इस पर मिस्र के पुजारी का नाम लिखा पाया गया। विश्वविद्यालय की टीम 2015 से इस प्राचीन मिस्र की ममी पर काम कर रही है। पिछले साल स्कैन में जब ममी के पेट के अंदर एक छोटा सा पैर दिखा, तब उन्हें समझ आया कि उनके हाथ क्या लगा है।(Photo-Warsaw Museum Project)

प्रसव के दौरान नहीं हुई थी महिला की मौत

शोधकर्ताओं ने भ्रूण की स्थिति और बर्थ कैनाल का अध्ययन कर बताया कि इस रहस्यमय महिला की प्रसव के दौरान मौत नहीं हुई थी। मौत के समय इस महिला के पेट में मौजूद भ्रूण 26 से 30 हफ्ते का था। टीम ने आशा जताई है कि यह बहुत संभव है कि अन्य गर्भवती ममी भी दुनिया के अलग-अलग सग्रहालयों में रखी हों। ऐसे में हमें उन सबकी जांच करने की आवश्यक्ता है। इस रहस्यमय महिला और उसके अजन्मे बच्चे का अध्ययन पोलैंड के वारसॉ विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् और पैलियोपैथोलॉजिस्ट मार्जेना ओलारेक-स्ज़िल्के और उनके सहयोगियों ने किया है।

एक्सपर्ट के लिए बनी हुई थी बड़ी पहेली

एक्सपर्ट्स के सामने एक बड़ी पहेली यह थी कि आखिर महिला के अंदर भ्रूण कैसे रह गया था। ममी बनाने के लिए मृतक के अंगों को निकाल दिया जाता था तो भ्रूण को क्यों नहीं अलग किया गया। पहले माना जा रहा था कि इसके पीछे कोई धार्मिक कारण हो सकता है। जांच टीम ने संभावना जताई ती कि हो सकता है उन्हें लगता हो कि अजन्मे बच्चे की आत्मा नहीं होती है और वह अगले दुनिया में सुरक्षित रहेगा या हो सकता है कि उसे निकालने में महिला के शरीर को नुकसान का खतरा रहा हो।