न करें पैंट की जेब में मोबाइल रखने की गलती, वरना पड़ सकता हैं भारी

न करें पैंट की जेब में मोबाइल रखने की गलती, वरना पड़ सकता हैं भारी

यूं तो मोबाइल के नुकसान को लेकर कई सर्वे आ चुके हैं और ये भी साबित भी हो चुका है कि मोबाइल और इस जैसी डिवाइस का इस्तेमाल बेडरूम में रिश्ते में दरार ला सकता है। ले‌किन एक नई स्टडी में कई हैरान करने वाली चीजें सामने आई है। स्टडी के मुताबिक, मोबाइल ना सिर्फ स्वास्‍थ्य के लिए खतरनाक है बल्कि पुरुषों को भी नपुंसक बना सकता है। फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स ने चेताया है कि जो शख्स एक दिन में कम से कम एक घंटा भी मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा है उसका स्पर्म नष्ट हो रहा है और स्तर में भी गिरावट आ रही है।

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि दिनभर में एक घंटा भी मोबाइल पर बात करने से पुरुषों की यौन क्षमता घटती है। पैंट की जेब में मोबाइल रखना भी इतना ही घातक है। मोबाइल चार्ज करते समय बात करना तो कई गुना नुकसानदायक है। इसका सीधा असर पुरुषों के स्पर्म पर पड़ता है। सलाह दी गई है कि रात को सोते समय भी मोबाइल दूर रखें। 106 युवाओं पर अध्ययन करने के बाद इजराइल के वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट प्रीप्रॉडक्टिव बायोमेडिसिन मैग्जीन में प्रकाशित हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम देशों में मोबाइल के कारण पुरुषों के स्पर्म की गुणवत्ता तेजी से घट रही है। 40 फीसदी मामलों में इसी कारण से पीड़ित पिता नहीं बना रहा है। ब्रिटिश विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल से निकलने वाली हिट और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें स्पर्म को ‘कूक’ करके खत्म कर देती हैं। अध्ययनकर्ताओं ने सलाह दी है कि मोबाइल जेब में नहीं, बल्कि अंगों से 20 इंच दूर रखा जाना चाहिए।

हैफा (इजराइल) की टेक्निओन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मार्था डर्नफील्ड का कहना है कि स्पर्म के स्तर तेजी से गिर रहा है जिसके कारण आने वाले वक्त में गर्भधारण बहुत मुश्किल हो जाएगा। बकौल मार्था, यदि आप परिवार बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं और एक साल में कामयाबी नहीं मिली है तो यह निश्चितरूप से मोबाइल का कुप्रभाव है।

भारत में यूजर्स औसतन 169 मिनट हर दिन स्मार्टफोन पर बिताते हैं इसमें से 02 घंटे सोशल मीडिया और चैटएप्स पर खर्च होते हैं। वहीं अमेरिका में एक दिन में सोशल मीडिया पर बिताया जाना वाला औसत वक्त 4.7 घंटे है।


क्या है ब्रेन फॉग? एक्सपर्ट से जानें इसके लक्षण और सावधानियां

क्या है ब्रेन फॉग? एक्सपर्ट से जानें इसके लक्षण और सावधानियां

Brain Fog Causes, Symptoms & Precautions: यदि आप छोटी-छोटी बातों को बार भूल रहे हैं या फिर आपके लिए अपनी ही कही बात को याद रखने में मुश्किल आ रही है, तो इसे ब्रेन फॉग (Brain Fog) कहते हैं ये कोई मेडिकल टर्म नहीं है बल्कि यह एक आम भाषा है, जिसके जरिए दिमाग से जुड़ी कई समस्याओं के ग्रुप के बारे में बताया जाता है, जैसे याददाश्त निर्बल होना, ध्यान न लगना, सूचना को समझने में परेशानी होना, थकावट रहना और इधर-उधर के विचार आना आदि ब्रेन फॉग के लक्षण दूसरी कई संभावित रोंगों में भी दिखाई देते हैं जैसे कैंसर और उसमें दी जाने वाली कीमोथेरेपी, डिप्रेशन, क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम और गर्भावस्था के दौरान भी ब्रेन फॉग की समस्या आ सकती है

हिंदुस्तान अखबार की न्यूज रिपोर्ट में एक अध्ययन के अनुसार लिखा है गया है कि कोविड-19 से ठीक हो चुके करीब 28 फीसदी लोगों ने ब्रेन फॉगिंग, मूड चेंज, थकान और एकाग्रता में कमी की कम्पलेन की है

क्या होते हैं ब्रेन फॉग के लक्षण?
दिल्ली के उजाला सिग्नस हॉस्पिटल (Ujala Cygnus Hospital) के निदेशक डॉ शुचिन बजाज (Shuchin Bajaj) ने इस न्यूज रिपोर्ट में बताया है कि ब्रेन फॉग के कारण आदमी के व्यवहार में तेजी से परिवर्तन आता है ऐसे लोगों में हमेशा थकान रहना, किसी कार्य में दिल न लगना, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, अपनी पसंद के कार्य भी रुचि का आभाव, लगातार सिर दर्द, नींद न आ पाना और छोटी-छोटी बातें भूल जाना जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं डॉक्टर खून की जाँच में इसका पता लग सकते हैं जैसे शुगर या थायरॉइड का अनबैलेंस, किडनी आदि का फंक्शन सही न होना, या किसी संक्रमण का होना या शरीर में पोषक तत्वों की कमी भी ब्रेन फॉग के रूप में दिखाई देती है

ब्रेन फॉग के कारण 
– नींद पूरी न होना
– स्क्रीन के साथ अधिक समय बिताना
– सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर प्रभाव डालने वाली समस्याएं, जैसे मल्टीपल स्केलेरोसिस
–  जिन रोगों में शरीर के अंदरूनी हिस्सों में सूजन आने की संभावना रहती है, या ब्लड शुगर का लेवल ऊपर-नीचे होने लगता है, उस वजह से भी ब्रेन फॉग की स्थिति हो सकती है जैसे डायबिटीज, हायपरथायरॉइड, डिप्रेशन, अल्जाइमर और एनीमिया

- 

कैंसर और कीमोथेरेपी
कैंसर के उपचार में दी जाने वाली कीमोथेरेपी में कुछ विशेष दवाएं होती हैं, जो याददाश्त पर प्रभाव डाल सकती हैं हालांकि, आमतौर पर यह समस्या अपने आप ठीक हो जाती है

क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम
अधिक थकान यानी क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम की स्थिति 6 महीने या उससे अधिक समय तक बनी रह सकती है इसमें आदमी को मानसिक थकान होती है, जिससे गफलत रहने लगती है

दवाओं का असर
कुछ दवाओं के सेवन से भी ब्रेन फॉग हो सकता है, डिप्रेशन या इन्सोम्निया में दी जाने वाली दवाएं सोचने समझने पर प्रभाव डालती हैं

- 

खान-पान और सावधानियां
– अपनी डाइट में अमीनो एसिड, विटामिन ए, बी, सी और ओमेगा 3 फैटी एसिड नियमित रूप से शामिल करें
– दोपहर में कैफिन युक्त पेय न लें
– शराब और स्मोकिंग से परहेज करें
– रोज 15 मिनट धूप लें
– नियमित अभ्यास जरूर करें
– लक्षणों के आधार पर डॉक्टर से एक्स रे, सीटी स्कैन, एमआरआई, एलर्जी टेस्ट आदि की सलाह भी ले सकते हैं
– कई मामलों में दवाओं के साथ थेरेपी भी इस समस्या से निपटने में मददगार हो सकती है