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महेश भट्ट की क्लासिक फिल्म जनम पर होगा नाटक का प्रदर्शन

साल 1985 में रिलीज हुई ‘जनम’ कद्दावर फिल्ममेकर महेश भट्ट की एक क्लासिक फिल्म है ‘अर्थ’ ‘डैडी’ और ‘हमारी अधूरी कहानी’ के बाद बहुत जल्द ‘जनम’ फिल्म पर भी आधारित नाटक देखने को मिलेगा समाज में ऐसे बिरले शख्स होते हैं जो अपने जीवन की पुस्तक के पन्ने खोलकर उसके राज को दुनिया के सामने खुलासा करने का साहस रखते हों इस लिहाज से ‘जनम’ एक ऐतिहासिक फिल्म है इसमें राहुल नाम के एक गैर कानूनी बेटे के संघर्ष की कहानी कही गई है

राहुल अपने पिता की तरह प्रसिद्ध होना चाहता है, यानी वह महत्वाकांक्षी फिल्म प्रोड्यूसर है, लेकिन उसके साथ कई दुश्वारियां हैं ना पिता का सपोर्ट है, ना उसके पास अच्छी स्क्रिप्ट है और ना ही फिल्म बनाने के लिए पैसे ऐसे में उसका एक दोस्त उसे सहायता करता है फिर बाद में उसकी गर्लफ्रेंड उसकी जीवन को बड़ा संबल देती है लेकिन राहुल की वास्तविक पीड़ा अपने पिता की नजरों में स्वीकार किये जाने की है

वास्तव में यह कहानी हमारे समय के चर्चित फिल्म निर्माता महेश भट्ट की जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है इस फिल्म को भी उन्होंने उसी शिद्दत के साथ लिखा जैसा कि अपनी जीवन में भोगा था उल्लेखनीय है कि महेश भट्ट की दूसरी ऑटोबायोग्राफिकल फिल्में मसलन ‘जख्म’ और ‘नाम’ को तो याद किया जाता है लेकिन ‘जनम’ जैसी अहम फिल्म कहीं खो-सी गई मानों समय की धूल की परतों में दब गई कुमार गौरव और शेरनाज़ पटेल की मुख्य भूमिकाओं वाली 16MM की यह फिल्म दूरदर्शन के लिए बनाई गई थी जिसे उस समय काफी सराहा गया था

अब फिल्म की कहानी पर दर्शकों के लिए आ रहा नाटक
अब जल्द ही यह फिल्म नाट्य रूप में स्टेज पर देखने को मिलेगी इस नाटक में महेश भट्ट के शिष्य इमरान जाहिद मुख्य किरदार निभाएंगे इमरान जाहिद इससे पहले इराकी पत्रकार मुंतधर अल-जैदी की पुस्तक पर आधारित ‘द लास्ट सैल्यूट’ जैसे गौरतलब नाटकों और ‘अर्थ’ ‘डैडी’ और ‘हमारी अधूरी कहानी’ जैसी महेश भट्ट की कई फिल्मों के नाट्य रूपांतरणों में एक्टिंग कर चुके हैं जाहिद को हाल ही की फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ में एक बिहारी आईएएस एस्पीरेंट अभय शुक्ला के दमदार किरदार के लिए जाना जाता है ‘जनम’ का नाट्य रुपांतरण जाने माने टीवी पर्सनाल्टी और स्क्रीन राइटर दिनेश गौतम ने किया है, जो इससे पहले फ़िल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ की कहानी और पटकथा के साथ ‘बात निकलेगी तो’ और ‘डैडी’ नाम के प्रसिद्ध नाटक भी लिख चुके हैं

महेश भट्ट ने स्वयं दी फिल्म की जानकारी
अपनी इस फिल्म के बारे में बात करते हुए महेश भट्ट नॉस्टेल्जिया से भर जाते हैं वो कहते हैं- मैंने जो बनाया है, वह सार्वजनिक है, अब केवल मेरा नहीं रह गया हालांकि इतने वर्ष हो गए हमारी भावनाएं अभी भी उससे जुड़ी हुई हैं ‘जनम’ का प्रसारण 1985 में हुआ था और पहली बार मेरी याददाश्त में फिल्म समाप्त होने तक 14 मिनट की देरी हुई थी उस समय यह एक अभूतपूर्व बात थी

फिल्म को बहुत प्रशंसा मिली और इसे 1986 के भारतीय तरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के पैनोरमा खंड में शामिल किया गया ‘जनम’ फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाला कलाकार गुमनाम हो गया, ऐसे में ‘जनम’ फिल्म भी कहीं खो गई ‘अर्थ’ और ‘डैडी’ नाटक की कामयाबी का स्वाद चखने के बाद जाहिद सातवें आसमान पर हैं महेश भट्ट कहते हैं, ‘जनम’ एक मुश्किल स्क्रिप्ट है, लेकिन यह जानकर अच्छा लगा कि इमरान ने परफेक्ट निशाना साधने का संकल्प लिया है

सामाजिक कलंक का नहीं था कोई भय
महेश भट्ट आगे कहते हैं – ‘मुझमें कभी कोई ऐसा बोध नहीं था जो सामाजिक कलंक से डरा हो मुझे इससे कोई भय नहीं था, हालांकि जब मैंने ‘जनम’ बनाई तो मेरा परिवार नाराज था और एकदम भी खुश नहीं था क्योंकि फिल्म समाज के मौजूदा मानदंडों के विरुद्ध सामाजिक क्षेत्र में लड़ने और उससे अलग होने को लेकर थी फिल्म का नाट्य रुपांतरण केवल अतीत में डूबना नहीं है, बल्कि इस अहसास के लिए है कि कभी-कभी पुनरावृत्ति इतिहास को फिर से बना सकती है

महेश भट्ट आगे यह भी जोड़ते हैं कि ‘खुद को जन्म देने का वह विचार अब भी बहुत प्रासंगिक है यह एक ऐसे आदमी की कहानी है जो दुनिया की परिपाटी में परिभाषित होने से इनकार करता है, क्योंकि वह अपना भाग्य स्वयं बनाना चाहता है मेरे परिवार को यह जानकर काफी सुखद आश्चर्य होगा कि इतने वर्षों बाद भी कोई आदमी बीते दिनों की याद को फिर से प्रासंगिक मान रहा है

स्क्रिप्ट लिखने वाले दिनेश गौतम ने बताई जानकारी
‘जनम’ को रंगमंच पर उतारने वाले पटकथा लेखक दिनेश गौतम कहते हैं- ‘इमरान और महेश जी साथ आते हैं तो कमाल होना तय है इन दोनों के साथ बैठक के बाद ये निश्चित हुआ कि अब महेश जी की फिल्म ‘जनम’ पर काम किया जाए वैसे तो महेश जी की हर फ़िल्म में उनके असल जीवन की झलक मिलती है पर जनम से बड़ा कुछ नहीं क्योंकि ‘जनम’ से ही किसी का भी पूरा जीवन, पूरा वजूद जुड़ा होता हैसामाजिक वर्जनाओं के बीच मिला जीवन उसे फिल्म में उतारना और दुनिया के सामने ये बात स्वीकारना ये हौसला की बात है इसी हौसला का नाम है महेश भट्ट उनकी बनाई किसी भी फ़िल्म को किसी भी तौर पर दोहराना बहुत चुनौती भरा होता है लेकिन महेश जी का इस दोहराव की प्रक्रिया में भी साथ रह कर हौसला देते रहना इस काम को संभव बनाता है ‘जनम’ और ‘डैडी’ को लिखते हुए मेरा यही अनुभव रहा है

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