हिंदुस्तान की 1.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में हुआ यह बड़ा परिवर्तन

हिंदुस्तान की 1.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में हुआ यह बड़ा परिवर्तन

हिंदुस्तान की 1.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से बेकार चल रही है. जाँच एजेंसियों व केंद्रीय बैंक की ओर से इस दौरान करीब तीन प्रमुख फाइनेंस कंपनियों को सीज कर दिया गया है. 

साथ ही केंद्रीय बैंक को पिछले दो वर्ष में तीन बार लोगों को भरोसा दिलाना पड़ा कि उनका पैसा सुरक्षित है. रिपोर्ट्स के अनुसार, हिंदुस्तान का मौजूदा वित्तीय संकट वर्ष 2008 के वित्तीय संकट से बहुत ज्यादा अलग है. 2008 में जहां अमेरिकी फाइनेंस कंपनियां संकट में आई व समस्या खड़ी हुई तो इस बार समस्या बहुत ज्यादा हद तक देश के भीतर से ही प्रारम्भ हुई है. सरकार के पास चुनौतियां कई हैं- सबसे बड़ी चुनौती ग्रोथ बढ़ाने को लेकर है साथ में बैड कर्ज़ की समस्या सरकार के सामने एक बड़ी समस्या बनी हुई है. ऐसे में क्या सरकार को अर्थव्यवस्था को गति देने की वाहवाही लूटनी चाहिए या फिर संसार के सबसे बेकार बैड कर्ज़ रेशियो को समाप्त करने की दिशा में कार्य करना चाहिए?

आर्थिक ग्रोथ में आ रही कमी की बड़ी वजह
भारतीय अर्थव्यवस्था वर्ष 2007 से 2012 के दौरान अपने उच्चतम स्तर पर थी, उसी दौरान सबसे ज्यादा लोन दिया गया, जो बैड कर्ज़ की वजह बना. इस दौरान बैंक की ओर से 400% ज्यादा तादाद में कर्ज़ दिया गया. अर्थव्यवस्था में सुस्ती का दौर उस वक्त प्रारम्भ हुआ, जब कई कंपनियां लोन चुकाने के लिए प्रयत्न करने लगी. इससे बैंक ज्यादा ब्याज देने से बचने लगे. इससे कारोबार के लिए बाजार में पैसे की कमी हो गई. इन्हीं वजहों से हिंदुस्तान की अर्थव्यस्था की गति सुस्ती होती गई. इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विस लिमिटेड (IL&FS) वर्ष 2018 में हिंदुस्तान की पहली नॉन बैंकिंग कंपनी थी, जो लोन न चुकाने के चलते डूबने की कगार पर पहुंची व सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा. इसे 2008 की अमेरिका की लेहमैन जैसी घटना माना जा रहा है.

आईएलएंडएफएस के डूबने के बाद से अब तक क्या हुआ
IL&FS के लोन में डूबने की वजह क्रेडिट की कमी थी. इसके बाद दीवान हाउसिंग फाइनेंस समूह (डीएचएफएल) भी इसी तरह के संकट में फंसा. डीएचएफएल का भी कंट्रोल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को अपने हाथों में लेना पड़ा. इसी तरह कुछ छोटी कर्जदाता कंपनियां भी 2019 में डूब गई व उनकी जाँच केंद्रीय एजेंसियों को सौंप दी गई है. साथ ही रिजर्व बैंक ने उनका कंट्रोल भी अपने हाथ में ले लिया है. 2020 में यस बैंक नकदी की समस्या से बंद होने की कगार में पहुंच गया. इसके बाद केंद्रीय बैंक ने यस बैंक से धन निकासी पर रोक लगा दिया था व सरकार के हस्तक्षेप के बाद एसबीआई के नेतृत्व में कई बैंक व वित्तीय संस्थानों को यस बैंक के रेस्क्यू के लिए आगे आना पड़ा.

यस बैंक के साथ क्या हुआ?
यस बैंक के पूर्व चीफ एक्जीक्यूटिव अधिकारी व को-फाउंडर राना कपूर के नेतृत्व में बैंक का तेजी से विस्तार किया गया. उनके कार्यकाल के आखिरी वर्ष मार्च 2018 में यस बैंक देश में सबसे ज्यादा कर्ज़ देने वाली बैंकों में एक बन गई. क्रेडिट सुइस ने वर्ष 2019 की रिपोर्ट में बोला गया था कि कंपनी ने उन कारोबारियों को सबसे ज्यादा कर्ज़ दिया, जो पहले से लोन में डूबे थे.

समस्या सुलझाने के लिए अथॉरिटी क्या कर रही हैं?
बैड कर्ज़ बढ़ने से अर्थव्यवस्था को नकुसान बढ़ने की संभावना जाहिर की गई. इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने 2015 में बैड कर्ज़ की स्थिति जानने के लिए गण्ना प्रारम्भ की, जिससे समस्या का पूरा स्वरूप सामने आया. बैंकिंग सेक्टर में नॉन परफार्मिंग एसेट्स 3% बढ़कर 9% से ज्यादा हो गया. इसके बाद, सरकार बैड कर्ज़ की रिकवरी के लिए नया दिवालियापन कानून लेकर आई. इन सब के बावजूद अर्थव्यवस्था में गिरावट आई तो अधिकारियों ने ताजा कर्ज़ लेने व कुछ उधारकर्ताओं व छोटे व्यवसायों की ओर अधिक उदारता दिखाने के लिए कदम उठाए. भारतीय रिज़र्व बैंक ने पिछले वर्ष बताया कि एनपीए में कमी आई है. इसके अतिरिक्त आईएलएंडएफएस व यस बैंक के डिफॉल्टरों से वसूली के लिए कदम उठाए जा रहे हैं.

क्या आगे भी बैड कर्ज़ व फाइनेंस सेक्टर में ऐसी मुसीबतें आएंगी?
ग्लोबल रेटिंग्स एजेंसी S&P ने चेतावनी दी है कि यस बैंक का बेलआउट पैकेज का साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा खतरनाक होने कि सम्भावना है. भारतीय रिजर्व बैंक के तहत रेस्क्यू प्लान में कुछ निवेशकों को हाइब्रिड बॉन्ड जारी करने की योजना प्रस्तावित है. फिच रेटिंग्स का बोलना है कि हिंदुस्तान के घरेलू रिटेल कर्ज़ बाजार को भरोसा बनाने के संकट का सामना करना पड़ सकता है. देश के चौथे सबसे बड़े व्यक्तिगत कर्जदाता यस बैंक व अन्य बैंकों, म्युचुअल फंड व बीमाकर्ताओं के बीच करीबी संबंध होने से फाइनेंस सेक्टर में रिस्क बढ़ता है. हिंदुस्तान की धीमी अर्थव्यवस्था को कोरोनोवायरस महामारी के कारण व अधिक खतरा है.

आरबीएल का डिपॉजिट घटा
निजी कर्जदाता आरबीएल बैंक ने गुरुवार को बोला कि सरकारी संस्थाओं व संस्थागत निवेशकों के पैसा निकालने की स्थान से उसे कुल जमाखातों में पिछले एक सप्ताह में करीब 3 प्रतिशत का नुकसान हुआ है. हालांकि इससे रिटेल डिपॉजिटर्स पर ज्यादा असर नहीं है. 31 दिसंबर तक बैंक का कुल डिपॉजिट करीब 62,907 करोड़ रुपए था. इसमें 16,855 करोड़ रुपए चालू व सेविंग एकाउंट है.