दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता टेक हब कैसे बना बेंगलुरु, लंदन से ज्यादा पैसा लगा रही हैं कंपनियां

दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता टेक हब कैसे बना बेंगलुरु, लंदन से ज्यादा पैसा लगा रही हैं कंपनियां

बेंगलुरु दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता टेक हब बन गया है। इसने लंदन, म्यूनिख, बर्लिन और पेरिस को पछाड़ दिया है। ये रिसर्च लंदन की एजेंसी Dealroom.co ने की है। रिपोर्ट के मुताबिक बेंगलुरु पर कंपनियां दिल खोलकर पैसा लगा रही हैं। सिर्फ पांच सालों में बेंगलुरु में निवेश पांच गुना से ज्यादा बढ़ गया। जबकि लंदन में महज तीन गुना ही बढ़ा।

बीते छह सालों में बेंगलुरु में 31 अरब डॉलर की स्टार्ट-अप फंडिंग हुई, 2115 स्टार्टअप की डील हुईं, कुल 1152 फंडेड स्टार्टअप्स हैं, 17 स्टार्टअप यूनिकॉर्न और 18 स्टार्टअप सूनिकॉर्न हैं। यूनिकॉर्न ऐसी कंपनियां हैं जिनकी मार्केट वैल्यू एक अरब डॉलर से ज्यादा है। सूनिकॉर्न ऐसी कंपनियां हैं जो 2022 तक यूनिकॉर्न बन सकती हैं। अब सवाल ये है कि ऐसा हुआ कैसे?

1970 के दशक में टेक सिटी बनने की ओर बढ़ गया था बेंगलुरु, इन्फोसिस ने की काया पलट
बेंगलुरु के टेक हब बनने की शुरुआत 1970 के दशक में हुई। तब कर्नाटक स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम के पहले अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक आरके बालिगा ने साउथ बेंगलुरु में 335 एकड़ जमीन पर इलेक्ट्रॉनिक सिटी बसाने की कल्पना की। आज यहां बेंगलुरु का सबसे बड़ा IT हब है।

1983 में इन्फोसिस पुणे से बेंगलुरु आई। इसने बेंगलुरु शहर को बदल दिया। आज टाटा कंसल्टेंसी के बाद ये भारत की दूसरी सबसे बड़ी IT कंपनी है। इसके बाद 2013 में विप्रो बेंगलुरु आई और 2015 में कंपनी का मुनाफा 7.1 अरब डॉलर हो गया।

2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार बेंगलुरु में 67 हजार IT कंपनियां खुल चुकी हैं। इसमें से 12 हजार कंपनियां अब भी काम कर रही हैं। अकेले बेंगलुरु में भारत के 35% IT प्रोफेशनल रहते हैं। यानी वहां की 84 लाख आबादी में 25 लाख लोग केवल IT सेक्टर में नौकरियां करते हैं।

अमेजन की वेंडर कंपनी के HR डिपार्टमेंट में काम करने वाले धर्मेंद्र दुबे कहते हैं, 'मैं गोरखपुर, यूपी के जिस इलाके से आता हूं, वहां 2005 में 10-20 गांवों में कोई एक व्यक्ति बेंगलुरु में नौकरी करता था, लेकिन अब यह आलम है कि हर घर से कोई न कोई बेंगलुरु में नौकरी कर रहा है।'

बेहद आसानी से मिलता है टेक टैंलेंट
बेंगलुरु में IIT, IIM, IIS, NCBS, NID, NIFT जैसे इंस्टीट्यूट्स हैं। बेंगलुरु के टेक हब बनने के पीछे सबसे बड़ी वजह यही है। बेंगलुरु इनोवेशन रिपोर्ट 2019 के अनुसार यहां दिल्ली से पांच गुना और मुंबई से करीब दो गुना ज्यादा इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट्स हैं।

बेंगलुरु के इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकॉनमिक चेंज के पूर्व निदेशक डॉ. आरएस देशपांडे कहते हैं, 'यहां आसानी से स्किल्ड टेक टैलेंट मिल जाता है। इन्फोसिस और विप्रो ने इस बात को साबित कर दिया। इन्फोसिस कंपनी को बनाने वाले नंदन निलेकणी, सुधा मूर्ति और नारायण मूर्ति सभी बेंगलुरु के थे। इन्होंने जो कारनामा किया, उससे आकर्षित होकर बाकी टेक कंपनियां भी बेंगलुरु आने लगीं। उनके लिए यहां के इंस्टीट्यूट्स ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी।'

ई-कॉमर्स, आईटी और रिसर्च एंड डेवलेपमेंट कंपनियों ने पहुंचाया टॉप पर
बेंगलुरु को टेक हब बनाने में दूसरी सबसे अहम भूमिका ई-कॉमर्स कंपनियों की है। कुल फंडिंग में ई-कॉमर्स स्टार्ट-अप का हिस्सा 30.8% है।

अमेजन की वेंडर कंपनी B&B ट्रिपलवॉल कंटेनर्स लिमिटेड के चेयरमैन मनीष गुप्ता कहते हैं, 'यहां जमीन, बिजली, लेबर सब बहुत महंगा है। लेकिन ई-कॉमर्स, टेक और आईटी कंपनियों के लिए ये बड़ा मसला नहीं है, क्योंकि इनमें से ज्यादातर के ऑफिस किराए पर होते हैं। इनके लिए बड़ा खर्च कर्मचारियों को सैलरी देना होता है। लेकिन मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए यहां टिकना आसान नहीं रह गया है। लेकिन यहीं पर ई-कॉमर्स, आईटी और रिसर्च एंड डेवलपमेंट से जुड़ी कंपनियां अभी और तेजी से आगे बढ़ती रहेंगी।'

12 महीने सुनहरा मौसम, 34 डिग्री से ज्यादा तापमान नहीं चढ़ता
बेंगलुरु का औसत अधिकतम तापमान 30 डिग्री और न्यूनतम 10.6 डिग्री सेल्सियस होता है। 2020 में यहां का सबसे ज्यादा तापमान 33.6 डिग्री था तो सबसे कम 5.8 डिग्री। डॉ. आरएस देशपांडे कहते हैं, 'बेंगलुरु के अच्छे मौसम और साफ-सुथरे शहर ने लोगों को यहीं बस जाने के लिए आकर्षित किया। बीते कुछ सालों में लाइफस्टाइल को भी लोगों ने तरजीह देनी शुरू की है। इसलिए स्टार्ट-अप के लिए अब ये जगह पहली पसंद हो गई है।'

बेंगलुरु में ही पले-बढ़े मनीष गुप्ता अपने बचपन को भी याद करते हैं। वे कहते हैं, 'जब 1970 के दशक में 7 की उम्र में मैं यहां आया तब घरों में पंखे नहीं हुआ करते थे। बेंगलुरु का मौसम बहुत अच्छा रहता था और इसे गार्डन सिटी ऑफ इंडिया कहा जाता था।'

अभी 15 सालों तक बनी रहेगी बेंगलुरु की रफ्तार
2020 में हुए कुल 924 स्टार्टअप कंपनियों के विलय और अधिग्रहण में 333 डील केवल बेंगलुरु में हुईं। ये रफ्तार अभी थमने वाली नहीं। एक रिपोर्ट की मुताबिक 2035 तक बेंगलुरु की GDP 8.5% की औसत दर से बढ़ेगी।

अमेजन की वेंडर कंपनी के चेयरमैन मनीष गुप्ता कहते हैं, 'ई-कॉमर्स, आईटी और रिसर्च एंड डेवलपमेंट से जुड़ी कंपनियां अभी और तेजी से आगे बढ़ती रहेंगी।'

बेंगलुरु के सिलिकॉन वैली बनने से स्थानीय लोगों पर पड़े असर के बारे में डॉ. देशपांडे कायप्पा की कहानी सुनाते हैं, 'मैं बेंगलुरु के जिस नगरभावी इलाके में रहता हूं, कभी वहां के पंचायत प्रमुख कायप्पा नाम के शख्स थे। उनके पास यहां चार से पांच एकड़ जमीन थी। जिससे उनकी मुश्किल से कुछ हजार रुपये की कमाई होती थी। बाद में उनके सबसे बड़े बेटे ने यह खेती योग्य भूमि, रिहायशी जमीन के तौर पर रजिस्टर करा ली और इस पर अपार्टमेंट बन गए। अब वो करोड़ों के आदमी बन गए हैं।'

 


अब नहीं रुलाएगी प्याज, किसान और ग्राहकों को ऐसे होगा फायदा

अब नहीं रुलाएगी प्याज,  किसान और ग्राहकों को ऐसे होगा फायदा

नोएडा यदि आलू (Potato) की पैदावार की बात करें तो उत्तर प्रदेश (UP) का देश में पहला जगह है लेकिन प्याज (Onion) के मुद्दे में उत्तर प्रदेश पिछड़ा हुआ है आवश्यकता का करीब 70 फीसद प्याज उत्तर प्रदेश को महाराष्ट्र (Maharashtra), कर्नाटक, राजस्थान (Rajasthan) और मध्य प्रदेश से खरीदना पड़ता है एक खास समय में प्याज के दाम बढ़ने पर प्याज और अधिक रुलाती है लेकिन अब उत्तर प्रदेश सरकार प्याज उगाने पर किसानों का अधिक फायदा कराएगी वहीं उत्तर प्रदेश में ही जरुरत का प्याज पैदा होने से ग्राहकों को भी महंगी प्याज नहीं खरीदनी पड़ेगी एक हेक्टेयर में प्याज उगाने पर किसानों को 12 हजार रुपये की सहायता दी जाएगी वहीं सरकार ने जो नियम रखे हैं उसके अनुसार गौतम बुद्ध नगर (Gautam Budh Nagar) के किसान भी अपने यहां प्याज उगा सकते हैं

सरकार चाहती है ऐसी स्थान उगाई जाए प्याज

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्याज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक हेक्टेयर में प्याज उगाने पर किसानों को 12 हजार रुपये की सहायता का ऐलान किया है लेकिन नियम यह है कि किसानों को ऐसी जमीन पर प्याज का उत्पादन करना होगा जहां बरसात का पानी न भरता हो खेती-किसानी से जुड़े गौतम बुद्ध नगर के जानकारों की मानें तो उनके जिले में बहुत सारी जमीन ऐसी है जहां बरसात का पानी नहीं भरता है ऐसे में उनके लिए प्याज की खेती बहुत ही लाभकारी साबित होगी, क्योंकि दिल्ली-एनसीआर में कई बड़ी मंडियां उन्हें प्याज बेचने के लिए मिल जाएंगी

एक वर्ष में 15 लाख मीट्रिक टन प्याज खाता है यूपी
उद्यान विभाग के निदेशक आरके तोमर के मुताबिक उत्तर प्रदेश में हर वर्ष करीब 15 लाख मीट्रिक टन प्याज की खपत होती है जबकि रवि और खरीफ दोनों सीजन में मिलाकर उत्तर प्रदेश में कुल 4.70 लाख मीट्रिक टन प्याज का ही उत्पादन होता है जिसकी बड़ी वजह है कि अभी उत्तर प्रदेश में केवल 28,538 हेक्टेयर जमीन पर ही प्याज की खेती की जा रही है

वहीं कृषि एक्सपर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्याज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए और आवश्यकता की 15 लाख मीट्रिक टन प्याज की खेती करने के लिए एक लाख हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता है जब एक लाख हेक्टेयर भूमि में प्याज की खेती होने लगेगी तो उत्तर प्रदेश की आवश्यकता पूरी हो जाएगी और उसे दूसरे राज्यों से प्याज नहीं खरीदनी पड़ेगी

यूपी के कृषि एक्सपर्ट ने इसके लिए एक योजना बनाई है योजना के अनुसार ऐसे जिले जहां बरसात का पानी नहीं भरता है में प्याज का उत्पादन करने को अहमियत दी जाएगी एक्सपर्ट कमेटी ने इसके लिए गंगा किनारे बसे वाराणसी, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर, कौशाम्बी, कानपुर, फतेहपुर, फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा और बुंदेलखंड के जिलों को चुना है साथ ही किसानों से भी अपील की है कि यदि उनके यहां ऐसी जमीन है जहां बरसात का पानी नहीं भरता है तो वो आगे आकर इस योजना में शामिल हो सकते हैं और सरकर की योजना का लाभ भी उठा सकते हैं

उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को बीज भी देगी सरकर

यूपी में प्याज की फसल बेहतर हो इसके लिए एग्रीफाउंड डार्क रेड, भीमा सुपर तथा लाइन 883 बीज किसानों को मौजूद कराए जा रहें हैं इस बीज से बेहतर प्रजाति का प्याज किसानों को मिलेगा और प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में अधिक प्याज की पैदावार होगी अमूमन एक हेक्टेयर क्षेत्र में करीब 50 हजार रुपए की लागत से करीब 150 से 200 कुंतल प्याज की पैदावार होती है इन बीजों के उपयोग से प्याज की पैदावार में वृद्धि होगा और किसानों की आय भी बढ़ेगी फ़िलहाल प्याज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रारम्भ किए गए इस इस्तेमाल को अगले रवी सीजन में भी लागू किया जाएगा, ताकि हर वर्ष प्याज उत्पादन को बढ़ावा मिले और अधिक से अधिक किसान प्याज की खेती करने में उत्साह दिखाएं


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