बिहार

मोदी सरकार बनने के बाद बिहार में फिर से लहलहाएगी नौकरी की फसल

नई दिल्ली केंद्र में तीसरी बार मोदी गवर्नमेंट बनने के बाद बिहार में बंद पड़े कल-कारखानों को दोबारा से प्रारम्भ करने की मांग बल पकड़ने लगी है ये मांगें इस बार जनता नहीं बल्कि, जनता के द्वारा चुनकर आए नए सांसदों के द्वारा उठाई जा रही है ये सांसद केंद्र गवर्नमेंट के विभिन्न मंत्रालयों और कैबिनेट मंत्रियों से मिलकर उनको अपने-अपने इलाकों की बंद पड़ी चीनी मिलें, पेपर मिलें या अन्य तरह के उद्योग धंधों की लिस्ट सौंप रहे हैं सांसदों की इस मांग पर केंद्र गवर्नमेंट ने भी विचार करना प्रारम्भ कर दिया है सूत्रों की मानें तो बहुत जल्द ही बिहार के लिए एक बड़ा आर्थिक पैकेज का घोषणा हो सकता है

समस्तीपुर से एलजेपी (रामविलास) के टिकट पर जीतकर आई राष्ट्र की युवा सांसदों में से एक शाम्भवी चौधरी मीडिया हिंदी के साथ वार्ता में कहती हैं, ‘देखिए, बिहार किसान प्रधान क्षेत्र है और मेरा क्षेत्र समस्तीपुर भी किसान प्रधान क्षेत्र है यहां पर मक्के की उपज अधिक होती है हम चाहेंगे कि समस्तीपुर में भी एक फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगे मैं इस सिलसिले में अपने नेता चिराग पासवान जी से भी बात करूंगी इसके साथ ही हम अशोक पेपर मिल हो या समस्तीपुर में बंद पड़े जूट मिल सभी को अहमियत के साथ दोबारा से प्रारम्भ करने की प्रयास करेंगे मेरी अहमियत रहेगी कि जो फैक्ट्री बंद हो गए हैं, वे फिर से प्रारम्भ हो जाएं इससे लोगों को रोजगार के साथ-साथ जॉब भी मिले

पिछले कई वर्षों से बिहार गवर्नमेंट दावा करती आ रही है कि बिहार के लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है लेकिन, हकीकत इससे एकदम उलट है बिहार में नए उद्योग धंधा लगाना तो दूर पुराने उद्योग धंधों की स्थिति भी बदहाल हो चुकी है जानकारों की मानें तो केवल सरकारी योजनाओं के सहारे कुछ ही लोगों को रोजगार मौजूद हो पा रहा है ऐसे में श्रमिकों का पलायन बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी है

ऐसे में केंद्र में बिहार कोटे के 8 मंत्री बनाए गए हैं एक-दो को छोड़ दें तो सभी मंत्रियों के पास बिहार में उद्योग धंधे लगाने या दोबारा प्रारम्भ का विभाग है बिहार में चीनी, पेपर, जूट, सूत और सिल्क उद्योग का बहुत सुनहरा अतीत रहा है बिहार के पहले सीएम श्री कृष्ण सिंह के समय में बिहार हिंदुस्तान की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला राज्य हुआ करता था बरौनी रिफाइनरी, बरौनी उर्वरक कारखाना, बोकारो स्टील प्लांट, बरौनी डेयरी, भारी इंजीनियरिंग उद्योग यहां स्थापित किए गए थे लेकिन, 80 के दशक के बाद और फिर झारखंड बनने के बाद बिहार बदहाल हो गया कई पेपर मील बंद हो गए और चीनी मीलें धूल फांक रही है

बिहार के जाने माने अर्थशास्त्री अजय कुमार झा कहते हैं, ‘ फूड इंडस्ट्री में तो हिंदुस्तान की ही हिस्सेदारी पूरे विश्व में 6-7 फीसदी से अधिक नहीं है तो सोचिए बिहार की स्थिति क्या होगी? यदि बिहार की बात करें ते यहां एग्रीकल्चर सेक्टर के कई प्रोडक्ट्स का पैकेजिंग कर आप निर्यात कर सकते हैं इससे बिहार का जीडीपी बढ़ेगा और लोगों के जीवन स्तर में काफी परिवर्तन भी आ जाएगा एमएसएमई सेक्टर में भी बिहार में अपार संभावनाएं हैं 30 करोड़ रुपये तक आप यहां व्यवसाय प्रारम्भ कर सकते हैं डेयरी में बिहार की स्थिति काफी ठीक हुआ है हम राष्ट्र में चौथे-पांचवे जगह पर आ गए हैं डेयरी प्रोडक्शन पर यदि ध्यान दिया जाए तो बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो एक समय बिहार में राष्ट्र की सबसे अधिक चीनी मिलें हुआ करती थीं राष्ट्र की 40 फीसदी तक चीनी उत्पादन बिहार में ही होता था बिहार के भिन्न-भिन्न जिलों में 28-30 चीनी मिलें थीं, जिनमें अभी मात्र 2-3 ही बचे हैं इसके अतिरिक्त भी केंद्र सराकर हाजीपुर औद्योगिक क्षेत्र, मुजफ्फरपुर औद्योगिक क्षेत्र , बिहटा पटना सिकंदरा औद्योगिक क्षेत्र, कुमारबाग बेतिया औद्योगिक क्षेत्र, मारंगा पूर्णिया औद्योगिक क्षेत्र , वृहत औद्योगिक क्षेत्र बरारी भागलपुर और बेगूसराय औद्योगिक क्षेत्र थे, जिनकी स्थिति दिन रोजाना खराब होते चली गई ऐसे में एक बार फिर से मोदी गवर्नमेंट से आशा जगने लगी है

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